
भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना को लेकर पर्यावरण और वन संरक्षण से जुड़े दावों पर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने अपना पक्ष स्पष्ट किया है। प्राधिकरण का कहना है कि यह परियोजना केवल आधुनिक सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पूरी योजना पर्यावरण संरक्षण, वन क्षेत्र की सुरक्षा और वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
एनएचएआई के देहरादून पीआईयू के परियोजना निदेशक श्री सौरभ सिंह ने बताया कि सड़क की इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करते समय यातायात क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को न्यूनतम रखना सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा। उन्होंने कहा कि वन क्षेत्र में परियोजना के लिए आवश्यक राइट ऑफ वे (ROW) को यथासंभव सीमित रखा गया है। साथ ही उत्तराखंड वन विभाग, WWF-India और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून के विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए विशेष संरचनाएं डिजाइन में शामिल की गई हैं।
परियोजना के तहत वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक प्रमुख ब्रिज-कम-एलीफेंट अंडरपास और चार समर्पित एलीफेंट अंडरपास बनाए जा रहे हैं। इनकी कुल एलिवेटेड लंबाई लगभग 3.5 किलोमीटर होगी। इसके अलावा बाघ, तेंदुआ, सियार, जंगल बिल्ली, साही, जंगली सूअर, सांभर और चीतल जैसे बड़े वन्यजीवों की आवाजाही के लिए 5×3 मीटर आकार के छह बॉक्स कल्वर्ट तैयार किए जा रहे हैं। वहीं छोटे वन्यजीवों, सरीसृपों और उभयचरों के लिए 1200 मिमी व्यास के 13 पाइप कल्वर्ट भी बनाए जाएंगे। एनएचएआई का कहना है कि इन उपायों से वन्यजीवों का प्राकृतिक मार्ग सुरक्षित रहेगा और सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली वन्यजीव मौतों में कमी आने की उम्मीद है।
एनएचएआई ने बताया कि परियोजना निर्माण के दौरान अतिरिक्त वन भूमि का उपयोग न हो, इसके लिए अधिकांश कार्य मौजूदा राइट ऑफ वे के भीतर ही किया जा रहा है। पर्यावरणीय प्रभाव कम करने के उद्देश्य से वन क्षेत्र में सड़क का राइट ऑफ वे 60 मीटर से घटाकर केवल 23 मीटर कर दिया गया है, जिससे अनावश्यक वन क्षेत्र प्रभावित होने से बचाया जा सके।
एनएचएआई ने जानकारी दी कि प्रतिपूरक वनीकरण और अगले दस वर्षों तक उसके रखरखाव के लिए 1.97 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा कराई गई है। इसके अतिरिक्त राज्य में हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए 40 हेक्टेयर गैर-वन भूमि राज्य सरकार द्वारा वन विभाग को हस्तांतरित की गई है, जहां भविष्य में नए वन विकसित किए जाएंगे। वन एवं पर्यावरण संरक्षण को मजबूत बनाने के लिए वन्यजीव राहत योजना और मिट्टी एवं जल संरक्षण योजना के क्रियान्वयन हेतु भी 6.04 करोड़ रुपये से अधिक की राशि उपलब्ध कराई गई है।
परियोजना में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कई अतिरिक्त व्यवस्थाएं भी शामिल की गई हैं। इनमें ग्रीन गाइड हेज, साउंड बैरियर, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन, वन्यजीव चेतावनी संकेत, स्पीड कैल्मिंग उपाय और नो हॉर्न जोन प्रमुख हैं। एनएचएआई का कहना है कि इन सभी उपायों का उद्देश्य मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव को कम करना तथा प्राकृतिक आवास को सुरक्षित बनाए रखना है।
परियोजना से प्रभावित कुल 4,369 पेड़ों में से 754 पेड़ों को फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) के वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर दूसरी जगह प्रत्यारोपित किया जाएगा। शेष पेड़ों का प्रबंधन नियमानुसार किया जाएगा। एनएचएआई ने कहा कि जहां भी संभव होगा, परिपक्व पेड़ों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित कर हरित आवरण को संरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा।
परियोजना निदेशक श्री सौरभ सिंह ने कहा कि कुछ समाचार रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट में यह दावा किया जा रहा है कि एनएचएआई और वन विभाग उच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करते हुए पेड़ों की कटाई कर रहे हैं। उन्होंने इन दावों को पूरी तरह गलत और भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि इस विषय में दायर अवमानना याचिका को भी उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था, जिससे स्पष्ट होता है कि परियोजना सभी वैधानिक प्रक्रियाओं और न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए आगे बढ़ रही है।
एनएचएआई ने स्पष्ट किया कि परियोजना का निर्माण सभी आवश्यक वन एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियां और सक्षम प्राधिकारियों की अनुमति प्राप्त होने के बाद ही शुरू किया गया है। प्राधिकरण का कहना है कि परियोजना के हर चरण में न्यायालय के निर्देशों, पर्यावरणीय शर्तों और वन संरक्षण से जुड़े सभी नियमों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।
एनएचएआई ने दोहराया कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। भानियावाला–जॉलीग्रांट–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना इसी सोच का उदाहरण है, जहां आधुनिक सड़क अवसंरचना के साथ वन संरक्षण, जैव विविधता और हरित आवरण को समान प्राथमिकता दी जा रही है।
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