
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने स्किन टू स्किन टच (Skin to Skin Touch) को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) के एक फैसले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य अपराधी को कानून के जाल से बचने की परमीशन देना नहीं हो सकता है। POCSO की धारा 7 के तहत टच और फिजिकल संपर्क अभिव्यक्ति के अर्थ को स्किन टू स्किन टच तक सीमित करना एक संकीर्ण सोच होगी। ये एक बेतुकी व्याख्या है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था?
बॉम्बे हाईकोर्ट नागपुर बेंच की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला (Justice Pushpa Ganediwala) ने 19 जनवरी को आदेश दिया था कपड़े हटाए बिना अंदरुनी अंग को छूना सेक्सुअल असॉल्ट नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा था कि जब तक स्किन का स्किन से टच न हो, तब तक यौन हमला (Sexual Assault)नहीं माना जाएगा। महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है। हाईकोर्ट ने ये फैसला 12 साल की एक नाबालिग के साथ हुए अपराध के मुकदमे की सुनवाई के बाद दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या तर्क दिए गए?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यौन हिंसा के इरादे से कपड़े/चादर के जरिए छूना पॉक्सो की परिभाषा में शामिल है। कोर्ट को अस्पष्टता की तलाश में अति उत्साही नहीं होना चाहिए। संकीर्ण व्याख्या से उद्देश्य को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी जिसमें POCSO एक्ट के तहत एक व्यक्ति को बरी कर दिया गया। उसे छोड़ने का तर्क था कि एक नाबालिग के स्तन को स्किन से स्किन के संपर्क के बिना छूना यौन हमला नहीं कहा जा सकता है। जज पुष्पा गनेडीवाला ने कहा था कि आरोपी ने बिना कपड़े निकाले बच्ची को छूआ है इसलिए अपराध को यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने 12 साल की लड़की के यौन उत्पीड़न के लिए 39 साल के आरोपी को तीन साल जेल की सजा सुनाई थी।
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