होली मनाने का यह खास तरीका भी अपनाते हैं ब्रजवासी, गुलाल लगाने के बाद जूते-चप्पल मारकर उठाते हैं पर्व का आनन्द

होली मनाने का यह खास तरीका भी अपनाते हैं ब्रजवासी, गुलाल लगाने के बाद जूते-चप्पल मारकर उठाते हैं पर्व का आनन्द

Published : Mar 19, 2022, 01:07 PM IST

ब्रज में होली का उत्सव अलग ही होता है और इस 40 दिवसीय होली महोत्सव में ब्रज में अलग-अलग तरह से आयोजन किया जाता है। ब्रज में लठमार होली, लड्डू होली, फूलों की होली के अलावा जूते चप्पल मार होली भी होती है। सैकड़ों साल से चली आ रही परंपरा का लोग आज भी निर्वहन कर रहे हैं।

मथुरा: ब्रज में होली का उत्सव अलग ही होता है और इस 40 दिवसीय होली महोत्सव में ब्रज में अलग-अलग तरह से आयोजन किया जाता है। ब्रज में लठमार होली, लड्डू होली, फूलों की होली के अलावा जूते चप्पल मार होली भी होती है। सैकड़ों साल से चली आ रही परंपरा का लोग आज भी निर्वहन कर रहे हैं। लोगों का कहना है की परंपरा टूटे नहीं इसलिए बड़े बुजुर्ग अपने से छोटे बच्चे और बुजुर्गों में गुलाल लगाने के बाद जूते और चप्पल उनके सिर पर मार कर होली का लुफ्त उठाते हैं।

ब्रज में अनेकों तरह से होली खेली जाती हैं। ब्रज में जहां बरसाना की लट्ठमार होली नंद गांव की लट्ठमार होली के अलावा यहां लड्डू होली फूलों की होली और जलेबी होली के साथ-साथ अनोखी होली का भी आयोजन किया जाता है। इस होली को हम अनोखी इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यहां गांव के लोग होली को अनोखे तरीके से खेलते हैं। बछगांव में दुल्हडी के दिन लोग पहले एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं और फिर उसके बाद पैरों में से जूता चप्पल निकालकर उनके सिर पर चप्पल जूतों की बरसात करते हैं। सैकड़ों हजारों साल से चली आ रही परंपरा कल लोग आज भी निर्वहन कर रहे हैं। बछगांव के योगेश कुंतल ने जानकारी देते हुए बताया कि बुजुर्गों द्वारा इस परंपरा को शुरू किया गया था। उन्होंने बताया कि बड़े बुजुर्गों के द्वारा गांव के ही मंदिर पर गुलाल लगाने के लिए जाया जाता है और वहां जो सैकड़ों साल पहले बुजुर्ग हुआ करते थे उन्होंने गुलाल लगाने के बाद मंदिर पर मौजूद अपने से बड़े लोगों की चरण पादुका को अपने सिर पर रखा तभी से इस होली का आयोजन यहां शुरू हो गया। आज के दिन इस परंपरा का गांव के सभी लोग निर्वहन करते हैं। योगेश बताते हैं के पहले गुलाल लगाया जाता है उसके बाद बुजुर्ग अपने से छोटे व्यक्ति को चप्पल जूते मारते हैं। उन्होंने इस परंपरा को कृष्ण कालीन बताया है।

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