कस्तूरबा नहीं, ये है गांधीजी की पत्नी का असली नाम, 7 साल की उम्र में थामा था हाथ

Published : Oct 02, 2019, 09:45 AM IST
कस्तूरबा नहीं, ये है गांधीजी की पत्नी का असली नाम, 7 साल की उम्र में थामा था हाथ

सार

एक वकील से सत्याग्रही बनने और भारत को आजादी दिलाने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी के बारे में पूरी दुनिया में बहुत लिखा गया है। लेकिन उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाली उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी के जीवन के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते हैं। 

नई दिल्ली। पूरी दुनिया में महात्मा गांधी के बारे में जितना लिखा गया है, उतना शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में लिखा गया हो। गांधी जी को महात्मा कह कर पहली बार विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने संबोधित किया था। तब से पूरी दुनिया में उन्हें महात्मा गांधी कहा जाने लगा। अहिंसा के इस पुजारी को देश ने राष्ट्रपिता का दर्जा देकर सम्मानित किया। लेकिन गांधीजी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाली और हर संघर्ष में उनका साथ देने वाली उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी के जीवन के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते हैं। यहां तक कि उनका असली नाम क्या था, इसके बारे में भी कम लोगों को ही पता होगा। महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर आज हम आपको बताने जा रहे हैं क्या था कस्तूरबा गांधी का असली नाम और उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में।

क्या था कस्तूरबा गांधी का असली नाम
कस्तूरबा गांधी का असली नाम कस्तूरबाई माखनजी कपाडिया था। उनका जन्म 11 अप्रैल, 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुलदास और मां का नाम व्रजकुंवर था। उनके दो भाई थे। उनके पिता का अफ्रीका और मिडल-ईस्ट के देशों में अनाज, कपड़े और कॉटन का बहुत बड़ा व्यापार था। वे एक समय पोरबंदर के मेयर भी रह चुके थे। गांधीजी के पिता करमचंद गांधी पोरबंदर के दीवान थे। गांधीजी की मां का नाम पुतली बाई था। दोनों परिवारों में गहरी दोस्ती थी। इसी वजह से गांधीजी की शादी कस्तूरबाई से करने का निर्णय दोनों परिवारों ने लिया। जब दोनों 7 साल के थे, तभी उनकी सगाई हुई और 13 साल की उम्र में साल 1882 में उनकी शादी हो गई।

साहसी महिला थीं कस्तूरबा गांधी 
कस्तूरबा गांधी एक साहसी महिला थीं और उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व था। वे उच्च नैतिक मानदंडों पर चलने वाली महिला थीं। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि शादी के बाद शुरुआती सालों में जब गांधीजी ने उन पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश की तो उन्होंने उसका विरोध किया। जब गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ अहिंसक आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने अपने पति का पूरा साथ दिया। चाहे वे गांधीजी के साथ रहीं या उन्हें उनसे अलग रहना पड़ा, हर हाल में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाया। वह बहुत ही अनुशासित और आत्मसम्मान से भरी महिला थीं। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए ही उन्होंने अपने सारे गहने दान कर दिए थे और बहुत ही सादगी भरा जीवन बिताती थीं। अफ्रीका में गांधीजी के संघर्षों में उन्होंने उनका हर कदम पर साथ दिया। वे बच्चों को बहुत स्नेह करती थीं। वहीं लोगों ने उन्हें प्यार और आदर से बा यानी मां कहना शुरू कर दिया। इसके बाद सभी उन्हें कस्तूरबा गांधी के नाम से ही जानने लगे।

भारत में भी स्वतंत्रता संग्राम में लिया भाग
जब साल 1914 में गांधी जी और कस्तूरबा गांधी भारत लौट आए और गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा तो कस्तूरबा गांधी ने हर कदम पर उनका साथ दिया। वह आश्रम में सभी के साथ रहती थीं और वहां की हर व्यवस्था का पूरा ध्यान रखती थीं। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद जब उन्होंने मुंबई के शिवाजी पार्क में सभा को संबोधित करने की कोशिश की तो पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया। उन्हें आर्थर रोड जेल में ले जाया गया। वहां जिस सेल में उन्हें रखा गया, वह बहुत ही गंदा और बदबूदार था। बाद में उन्हें पूना के आगा खां पैलेस में ले जाया गया, जहां गांधीजी को भी कैद कर रखा गया था।

एक पत्नी और मां के रूप में अतुलनीय भूमिका निभाई
कस्तूरबा गांधी ने एक पत्नी और मां के रूप में भी अतुलनीय भूमिका निभाई। पति के संघर्षों में साथ देने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ देश के नाम अर्पित कर दिया। उन्होंने अपने सारे गहने और बहुमूल्य चीजें दान में दे दी। उनके दरवाजे हर आदमी के लिए खुले थे। वह हर किसी की मदद करती थीं। बीमारों का ख्याल रखना, उन्हें समय पर दवा देना उनका काम था। आश्रम में किसी को कोई तकलीफ तो नहीं, इसका ख्याल वह किसी मां की तरह रखती थीं। सभी लोग उन्हें बहुत चाहते थे। 

आगा खां महल में ही ली आखिरी सांस
कस्तूरबा गांधी ने आगा खां महल के डिटेंशन कैंप में ही आखिरी सांस ली। 22 फरवरी, 1944 की शाम को उनकी म़त्यु हो गई। उस समय गांधीजी वहीं मौजूद थे। आगा खां महल में ही 23 फरवरी, 1944 को उनका अंतिम संस्कार हुआ। गांधीजी तब तक वहां बैठे देखते रहे जब तक चिता पूरी तरह जल नहीं गई। जब किसी ने उनसे बीच में ही जाने को कहा तो गांधीजी ने जवाब दिया कि  62 साल तक एक साथ जीवन गुजारने के बाद यह अंतिम रूप से अलगाव हो गया। कम से कम चिता को पूरी तरह जलता तो देखने दो। उसी शाम प्रार्थना सभा की समाप्ति के बाद गांधीजी ने कहा कि मैं बा के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। सरोजिनी नायडू ने कस्तूरबा गांधी को भारतीय स्त्रीत्व का प्रतीक बताया।  
 

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