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ये यारी है बड़ी प्यारी; नर्सरी से क्लास 6th तक दोस्त को इस वजह से गोद उठाकर स्कूल लाते रहे साथी

First Published Feb 18, 2020, 11:20 AM IST
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बेंगलुरु. दोस्ती-यारी के लाखों किस्से आपने सुने होंगे। दोस्त एक-दूसरे के लिए जान देने को तैयार रहते हैं। ऐसे दोस्त जो बहुत बार मदद और खुशी का एकमात्र सहारा होते हैं। स्कूल के दिनों में दोस्ती की कहानियां सबके पास होती हैं। पर कहीं न कहीं कभी न कभी हमें कुछ ऐसी कहानियां भी मिल जाती हैं जो दिल को झकझोर देती हैं। ऐसे ही बेमिसाल कहानी हमारे सामने आई है बेंगलुरू से। यहां एक दिव्यांग दोस्त को बचपन से लेकर अब तक उसको दोस्त कमर पर लाद या गोदी में उठाकर स्कूल लेकर आ रहे हैं। अपने दोस्त को स्कूल की सीढ़ियों पर चढ़ाने से लेकर स्कूल से वापस घर ले जाने तक का ये मेहनती काम उसके दिलेर और जिगरी यार खुद करते रहे हैं। 

16 साल के लक्ष्मीश नाइक को जन्म के एक साल बाद ही पोलियो हो गया था। वो एक गरीब परिवार से है तो ऐसे में व्हील चेयर आदि का इंतजाम भी नहीं हो सकता। वह कभी भी चलने में सक्षम नहीं हुआ है, फिर भी उसने पूरी तरह से सामान्य जीवन जिया है। और इसकी बड़ी वजह है उसके सच्चे यार। स्कूल में उसके दोस्त उसे हमेशा एक साधारण बच्चे जैसे जिंदगी जीने को प्रेरित करते रहे हैं। वे खुद को अपाहिज न समझे और मदद के लिए किसी पर निर्भर न रहे इसलिए दोस्तों का पूरा ग्रुप उसकी मदद के लिए मौजूद रहा है।

16 साल के लक्ष्मीश नाइक को जन्म के एक साल बाद ही पोलियो हो गया था। वो एक गरीब परिवार से है तो ऐसे में व्हील चेयर आदि का इंतजाम भी नहीं हो सकता। वह कभी भी चलने में सक्षम नहीं हुआ है, फिर भी उसने पूरी तरह से सामान्य जीवन जिया है। और इसकी बड़ी वजह है उसके सच्चे यार। स्कूल में उसके दोस्त उसे हमेशा एक साधारण बच्चे जैसे जिंदगी जीने को प्रेरित करते रहे हैं। वे खुद को अपाहिज न समझे और मदद के लिए किसी पर निर्भर न रहे इसलिए दोस्तों का पूरा ग्रुप उसकी मदद के लिए मौजूद रहा है।

बेंगलुरू में ईस्ट-वेस्ट पब्लिक स्कूल के छात्रों का ये पूरा एक ग्रुप लगभग एक दशक से लक्ष्मीश को स्कूल लेकर आ रहा है। उन्होंने पिछले दस सालों में उसे क्लास में लेकर आने, वापस ले जाने, किसी भी जगह ले जाने और छुट्टी के दिन उसके साथ खेलने तक के सारे काम में मदद की है। स्कूल के फेस्ट और कार्यक्रमों में भाग लेने तक में ये दोस्त उसकी मदद को चार कदम आगे रहे हैं। ये सब लगातार स्कूल में चल ही रहा था। अब उनके एक टीचर ने बच्चों के इस जज्बे और दमदार दोस्ती की कहानी सोशल मीडिया पर शेयर कर दी। शिक्षक, ग्रेसी सीतारमण ने इस कहानी को शेयर किया। ग्रेसी अपने इन स्टूडेंट्स पर बहुत गर्व करती हैं। वो बताती है कि कैसे उन्होंने इन लड़कों को नर्सरी से अब तक बड़े होते देखा और अपने इस दोस्त की मदद में हमेशा हाजिर पाया।

बेंगलुरू में ईस्ट-वेस्ट पब्लिक स्कूल के छात्रों का ये पूरा एक ग्रुप लगभग एक दशक से लक्ष्मीश को स्कूल लेकर आ रहा है। उन्होंने पिछले दस सालों में उसे क्लास में लेकर आने, वापस ले जाने, किसी भी जगह ले जाने और छुट्टी के दिन उसके साथ खेलने तक के सारे काम में मदद की है। स्कूल के फेस्ट और कार्यक्रमों में भाग लेने तक में ये दोस्त उसकी मदद को चार कदम आगे रहे हैं। ये सब लगातार स्कूल में चल ही रहा था। अब उनके एक टीचर ने बच्चों के इस जज्बे और दमदार दोस्ती की कहानी सोशल मीडिया पर शेयर कर दी। शिक्षक, ग्रेसी सीतारमण ने इस कहानी को शेयर किया। ग्रेसी अपने इन स्टूडेंट्स पर बहुत गर्व करती हैं। वो बताती है कि कैसे उन्होंने इन लड़कों को नर्सरी से अब तक बड़े होते देखा और अपने इस दोस्त की मदद में हमेशा हाजिर पाया।

वह कहती हैं, "छह साल से मैंने उन्हें लगातार दोस्त की मदद करते देखा है और मुझे खुशी है कि दूसरे लोग भी उनकी कहानी पढ़ेंगे और प्रेरित होंगे।" टीचर कहती हैं कि मार्क्स तो बच्चे ले ही आते हैं लेकिन ये इंसानियत और मदद की भावना हर कोई नहीं कमा पाता। टीचर बताती हैं कि, जब मैंने इन लड़कों से पूछा कि क्या लक्ष्मीश को गोद में उठाकर सीढ़ियों के रास्ते क्लास तक ले जाना बोझ नहीं लगता, काफी मुश्किल होता होगा? तो उसके दोस्त एकजुट होकर जवाब देते हैं, “बिल्कुल भी नहीं मैम, हम में से बहुत से लोग हैं जो दिव्यांग हैं और हमें उनकी मदद करने के लिए एक साथ आना होगा। ”

वह कहती हैं, "छह साल से मैंने उन्हें लगातार दोस्त की मदद करते देखा है और मुझे खुशी है कि दूसरे लोग भी उनकी कहानी पढ़ेंगे और प्रेरित होंगे।" टीचर कहती हैं कि मार्क्स तो बच्चे ले ही आते हैं लेकिन ये इंसानियत और मदद की भावना हर कोई नहीं कमा पाता। टीचर बताती हैं कि, जब मैंने इन लड़कों से पूछा कि क्या लक्ष्मीश को गोद में उठाकर सीढ़ियों के रास्ते क्लास तक ले जाना बोझ नहीं लगता, काफी मुश्किल होता होगा? तो उसके दोस्त एकजुट होकर जवाब देते हैं, “बिल्कुल भी नहीं मैम, हम में से बहुत से लोग हैं जो दिव्यांग हैं और हमें उनकी मदद करने के लिए एक साथ आना होगा। ”

दिव्यांग लक्ष्मीश अपने दोस्तों की तारीफ करते नहीं थकते हैं। वे बताते हैं कि, "मुझे यकीन नहीं होता कि क्लास नर्सरी से अब तक वो मेरी लगातार मदद करते रहेंगे। उनकी मदद की वजह से ही मैं इतनी दूर तक आ गया हूं।   मुझे हमेशा से पता है कि चाहे जो भी हो, मेरे दोस्त हमेशा मेरी मदद करने के लिए मौजूद रहेंगे। चाहे वह स्कूल के कार्यक्रम के लिए हो या रोजमर्रा के कार्यों के लिए, मेरे दोस्त मुझे साथ ले जाने के लिए वहां गए हैं।

दिव्यांग लक्ष्मीश अपने दोस्तों की तारीफ करते नहीं थकते हैं। वे बताते हैं कि, "मुझे यकीन नहीं होता कि क्लास नर्सरी से अब तक वो मेरी लगातार मदद करते रहेंगे। उनकी मदद की वजह से ही मैं इतनी दूर तक आ गया हूं। मुझे हमेशा से पता है कि चाहे जो भी हो, मेरे दोस्त हमेशा मेरी मदद करने के लिए मौजूद रहेंगे। चाहे वह स्कूल के कार्यक्रम के लिए हो या रोजमर्रा के कार्यों के लिए, मेरे दोस्त मुझे साथ ले जाने के लिए वहां गए हैं।

लक्ष्मीश के दोस्त सिद्धार्थ और मयूर कहते हैं कि, हम उसे काफी समय से जानते हैं, हमारी दोस्ती स्कूल और बाहर पक्की रहेगी। उसके बिना हम अपना ग्रुप सोच भी नहीं सकते हैं। मयूर बताते हैं कि वे मुझे हमेशा सब्जेक्टस में डाउट्स क्लियर करने में मदद करता है और पढ़ाई में वो बहुत अच्छा है। ऐसे में हमारी दोस्ती एक दूसरे के बिना अधूरी है। वहीं लक्ष्मीश चाहते थे कि उनके दोस्तों का नाम तो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए आज के मतलबी दुनिया में कोई किसी के लिया इतना नहीं करता।

लक्ष्मीश के दोस्त सिद्धार्थ और मयूर कहते हैं कि, हम उसे काफी समय से जानते हैं, हमारी दोस्ती स्कूल और बाहर पक्की रहेगी। उसके बिना हम अपना ग्रुप सोच भी नहीं सकते हैं। मयूर बताते हैं कि वे मुझे हमेशा सब्जेक्टस में डाउट्स क्लियर करने में मदद करता है और पढ़ाई में वो बहुत अच्छा है। ऐसे में हमारी दोस्ती एक दूसरे के बिना अधूरी है। वहीं लक्ष्मीश चाहते थे कि उनके दोस्तों का नाम तो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए आज के मतलबी दुनिया में कोई किसी के लिया इतना नहीं करता।

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