गौरा को ब्याह कर कैलाश ले गए भगवान शिव, शिव-धुन पर थिरकते रहे हजारों भक्त
वाराणसी(Uttar Pradesh ). धर्म की नगरी काशी में आज से होली की सही हुड़दंग शुरू हो गई। रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव और मां गौरा के गौने के अवसर से ही काशी में होली की शुरुआत हो जाती है। हजारों की संख्या में भक्तों ने भगवान शिव के गौने में भाग लिया। भक्तों ने मथुरा से आए स्पेशल फूलों के बने अबीर-गुलाल उड़ाकर भगवान शिव के गौने में खूब मौज मस्ती की। शिव धुन पर पूरे रास्ते भक्त थिरकते रहे।
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मान्यता है कि शिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ के विवाह के बाद रंगभरी एकादशी पर गौना होता है। काशी में गौरा को ब्याहने के बाद गौना कर कैलाश ले जाते हैं इस मौके पर बाबा अपने गणों को खुशी में डूबने का मौका होली के तौर पर देते हैं। गुरुवार शाम को इस परंपरा की शुरूआत शोभायात्रा के तौर पर बड़ादेव स्थित गेस्ट हाउस से शुरू हुई जो विश्वनाथ मंदिर तक पहुंचकर पूरी होगी।
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काशीवासी अपने आराध्य बाबा विश्वनाथ के गौने में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे थे। भगवान भोलेनाथ के सिर पर राजस्थानी पगड़ी तो तन पर खादी का कुर्ता -धोती सजा था। वहीं मां गौरा केशरिया बनारसी जरीदार साड़ी में सुशोभित हो रही थीं। गौरा की आंखों में बाबा के खप्पर की कालिमा काजल के रूप में सजी थी। चारों तरफ सिर्फ हर-हर महादेव के उद्घोष के शब्द सुनाई दे रहे थे।
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महंत कुलपति तिवारी के मुताबिक पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव हिमालय की पुत्री गौरा का गौना लेने पहुंचे थे। उस समय पूरी शिव बारात हिमालय पहुंची थी। यहाँ भी उसी परम्परा का निर्वहन होता है।
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काशी में रंगभरी एकादशी का अलग महत्व है। इस दिन बाबा व माता गौरा का गौना महोत्सव मनाने की विशेष परंपरा है। इसके अलावा विश्वनाथ मंदिर के साथ अन्य मंदिरों और शिवालयों में गुलाल और पुष्प की होली खेली जाती है। ज्योतिषाचार्य दिनेश मिश्रा के मुताबिक एकादशी तिथि गुरुवार को सुबह 7.52 बजे लगी है जो छह मार्च को सुबह 6.51 बजे तक रहेगी।
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काशी में एकादशी के दिन श्रीकाशी विश्वनाथ का अबीर-गुलाल से विधिवत पूजन-अभिषेक किया जाता है। शिवालयों में माता पार्वती संग भगवान शिव की गुलाल-पुष्प से होली होती है और होलिकोत्सव आरंभ हो जाता है।
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