ओव्यूलेशन क्या है, इसके लक्षण क्या हैं और गर्भधारण के लिए इसका महत्व क्या है? अनियमित पीरियड्स और ओव्यूलेशन के बीच क्या संबंध है? जानिए ओव्यूलेशन से जुड़ी सारी जानकारी। 

हेल्थ डेस्क। आजकल बदलती लाइफस्टाइल के कारण महिलाओं में अनिमित पीरियड्स आम बात है। इस वजह से वे ओव्यूलेशन सर्किल को लेकर भी अक्सर कंफ्यूज रहती है। ये ऐसा प्रोसेस होता है जब अंडाशय से निकला अंडाणु प्रजनन यानी इंटरकोर्स के लिए तैयार रहता है। इस दौरान प्रेगनेंसी के चांसेस हाई होते हैं। हालांकि ओव्यूलेशन होने से पहले शरीर में ऐसे कई बदलाव दिखाई हैं जिन्हें देख आप अपनी सर्किल का पता लगा सकती हैं। ये कंसीव करने और अनवॉन्डेंट प्रेगनेंसी से बचाव में मदद करता है।

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आखिर क्या होता है ओव्यूलेशन?

ओव्यूलेशन महिलाओं के शरीर में होने वाला नेचुरल प्रोसेस है। जो आमतौर पर पीरियड्स के बाद होती है। हर महिला का मासिक धर्म चक्र अलग-अलग होता है। ऐसे में ओव्यूलेशन का टाइम भी अलग होगा। वैसे तो ज्यादतर महिलाओं में ये दोनों प्रक्रिया अलग-अलग वक्त पर होती हैं लेकिन कई महिलाएं पीरियड्स के दौरान ओव्यूलेशन के लक्षण महसूस करती हैं। ये चीजें उन महिलाओं के साथ ज्यादा होता है जिनका मासिक चक्र 20 दिन से कम होता है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है क्या पीरियड्स के साथ ओव्यूलेशन हो सकता है। तो जवाह है हां परंतु ये हर महिला में नहीं होता। महिलाओं में पीरियड्स साइकिल आमतौर पर 21-35 दिनों की होती है लेकिन कई महिलाएं में ये 20 दिन की देखी जाती है। ऐसे में चक्र के छोटे होने के कारण वह पीरियड्स के दौरान ओव्यूलेशन के लक्षण महसूस कर सकती हैं।

कैसे पहचानें ओव्यूलेशन के लक्षण

  • ओव्यूलेशन के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन लेवल में बदलाव होता है। जिससे उन्हें शरीर में हल्का दर्द या भारीपन महसूस होता है।
  • कुछ महिलाओं में ओव्यूलेशन के दौरान शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
  • ओव्यूलेशन की सबसे बड़ी पहचान म्यूकस है, अगर ये पतला है तो आप इसे संकेत समझ सकती हैं।
  • ओव्यूलेशन के दौरान कुछ महिलाओं को पेट के निचले हिस्से में दर्द की समस्या रहती है, हालांकि ये बहुत कम होता है।

प्रेगनेंसी के लिए जरूरी ओव्यूलेशन

ओव्यूलेशन-पीरियड्स के बीच 15 दिनों का अंतर होता है। आप कंसीव करना चाहती हैं तो ओव्यूलेशन के बारे में जरूर पता होना चाहिए। इस दौरान शरीर में कई हॉर्मोनल बदलाव होते हैं। जो शरीर की प्रजनन प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ ही गर्भधारण की संभावना भी बढ़ाती है।

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