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धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का लाभ मिले या नहीं...पूर्व सीजेआई बालाकृष्णन का पैनल देगा रिपोर्ट

हिंदू धर्म के अनुसूचित जाति के लोगों के धर्म परिवर्तन के बाद उनको अनुसूचित जाति का आरक्षण या लाभ नहीं मिल पाता था। अपना स्टेटस बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी।

Central Government forms panel under Former CJI Balakrishnan to consider SC status for converted peoples, DVG
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First Published Oct 7, 2022, 3:17 PM IST

नई दिल्ली। हिंदू धर्म से दूसरे धर्मों को स्वीकारने के बाद भी अनुसूचित जाति का स्टेटस बरकरार रखने की मांग पर केंद्र सरकार ने रिटायर्ड चीफ जस्टिस बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक पैनल का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया था। दरअसल, हिंदू धर्म के अनुसूचित जाति के लोगों के धर्म परिवर्तन के बाद उनको अनुसूचित जाति का आरक्षण या लाभ नहीं मिल पाता था। अपना स्टेटस बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई 
थी।

पैनल में कौन कौन?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता में गठित पैनल तीन सदस्यीय है। के जी बालकृष्णन सुप्रीम कोर्ट के पहले दलित मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। पूर्व सीजेआई के अलावा सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डॉ.रविंद्र कुमार जैन और यूजीसी की सदस्य प्रो.सुषमा यादव को पैनल में शामिल किया गया है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने पैनल को गजट किया है। अधिसूचना में कहा गया है कि आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। पैनल अध्यक्ष के कार्यभार संभालने की डेट से दो साल के भीतर रिपोर्ट देना होगा।

क्या करेगा पैनल?

पैनल नए व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के मामले की जांच करेगा जो ऐतिहासिक रूप से अनुसूचित जाति का होने का दावा करते हैं लेकिन उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है। पैनल इन लोगों के अन्य धर्मों में परिवर्तित होने के बाद, रीति-रिवाजों, परंपराओं, सामाजिक भेदभाव और अभाव की स्थिति में बदलाव को ध्यान में रखते हुए मौजूदा अनुसूचित जातियों पर होने वाले निर्णय के प्रभावों की भी जांच करेगा। यह तय करेगा कि क्या उन लोगों को जो अनुसूचित जाति के तो रहे हैं लेकिन धर्म परिवर्तन कर लिया है, को धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति का दर्जा बहाल रखा जाना चाहिए या नहीं। दरअसल, संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 कहता है कि हिंदू या सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है। लेकिन मुस्लिम व ईसाई समाज ने हमेशा ही उन दलितों के लिए समान स्थिति की मांग की है जो धर्म परिवर्तन कर इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं। हालांकि, बीजेपी इसका विरोध करती रही है।
 

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