राहुल चिमुरकर.  'मैं सांस नहीं ले सकता' (I can’t breath) अमेरिका के मिनेपॉलिस (मिनेसोटा) में अपने जीवन की भीख मांगते हुए जॉर्ज फ्लॉयड के यही आखिरी शब्द थे। जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के कुछ मिनटों बाद ही #Allives, #blacklives matter जैसे हैशटैग के साथ सोशल मीडिया पर बाढ़ सी आ गई। इनमें प्रमुख हस्तियां, बुद्धिजीवी और वे आम लोग भी शामिल थे, जिन्होंने फ्लॉयड की वह आखिरी तस्वीर टीवी पर देखी थी। लेकिन भारत में दलितों के लिए आवाज कभी नहीं उठाई जाती है। उत्तरी पूर्वी दिल्ली में इस साल नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर फरवरी में दंगे हुए थे। इन दंगों में शहरी नक्सल-जिहादी ताकतें दंगों के दौरान दलितों को निशाना बना रही थीं, उनकी हत्या कर रही थीं, तब ये कथित बुद्धिजीवी कहां थे? 

दिल्ली दंगों में दलितों को चुनकर निशाना बनाया गया

दिल्ली दंगों में सबसे नृशंस हत्याओं में से एक, 24 फरवरी 2020 की रात को यमुना विहार के ब्रह्मपुरी में अनुसूचित जाति के शख्स विनोद कुमार कश्यप की थी। दिल दहला देने वाला वीडियो 25 फरवरी तक सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका था। इसमें दिख रहा था कि भीड़  'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे लगाती हुई उनकी लिंचिंग कर रही है। इस वीडियो में दिख रहा है कि कैसे उनके शरीर को सड़कों पर घसीटते हुए और 'दूसरी तरफ' फेंका जाता है। इस घटना में विनोद के मोनू कश्यप किसी तरह से बच गए। वीडियो में दिख रहा है कि कैसे वह अपने पिता को बचाने की कोशिश कर रहा है। कुछ ही मिनटों में भारत की राजधानी के बीचों-बीच एक दलित जीवन को एक धार्मिक भीड़ ने खत्म कर दिया। इस घटना से कोई भी उम्मीद कर सकता है कि इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाया जाएगा। लेकिन इस घटना पर हर तरफ सिर्फ सन्नाटा नजर आ रहा था। 

विनोद कुमार कश्यपएक सामाजिक व्यक्ति 

विनोद कुमार कश्यप कोई मामूली इंसान नहीं थे। वे शारीरिक रूप से मजबूत, परिश्रमी व्यक्ति थे। उन्होंने बिजली का काम करके शुरुआत की। इस काम से आय को बचाते हुए उन्होंने धीरे-धीरे खुद का घर बनाया। अब वे शादियों और जागरणों में डीजे भी लगाते थे। हर साल वह जून में होने वाली वार्षिक कांवर यात्रा में कांवरिया के रूप में यात्रा करते थे। वह एक सामाजिक व्यक्ति थे, और प्यार से उन्हें भोले बाबा (भगवान शिव का दूसरा नाम) से भी जाना जाता था। 

क्या हुआ था उस रात?

24 फरवरी 2020 की रात लगभग 10.30 बजे विनोद कश्यप अपने पोते के लिए दवाइयां खरीदने के लिए घर से बाहर निकले थे। वह कुछ दिनों से बीमार था। उनके बेटे, मोनू कश्यप ने उन्हें कल्याण मेडिकल स्टोर तक मोटरसाइकिल से चलने के लिए कहा। दुकान मुश्किल से कुछ मीटर दूर थी, हालांकि, वह क्षेत्र तनावपूर्ण था। विनोद कश्यप अपने पोते की परेशानी को सहन नहीं कर पा रहे थे और वे किसी भी तरह से दवा ले आना चाहते थे।

तभी कहीं से एक बड़ा पत्थर आकर मोनू कश्यप को लगा और जिस बाइक पर दोनों बैठे थे, वह गिर गई। अंधेरे से 'अल्लाह-हु-अकबर' चिल्लाते हुए 200 लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। इनके हाथ में पत्थर और लोहे की छड़ थीं। उन्होंने विनोद कश्यप और मोनू को घेर लिया। दोनों पर तब तक हमला किया गया, जब तक मोनू ने बेहोश होने का नाटक नहीं किया। यह इतना क्रूर हमला था कि कुछ मिनटों में ही विनोद की मौत हो गई। परिवार के सदस्य बताते हैं कि विनोद कश्यप इलाके में एक जाना माना चेहरा थे। बेहद लोकप्रिय हिंदू समुदाय के नेता। परिजनों का मानना है कि उनकी पहचान के चलते ही निशाना बनाया गया था।

दिल्ली दंगों में कई और दलितों को भी हिंसा के चलते खामियाजा भुगतना पड़ा। दिनेश कुमार खटीक की राजधानी पब्लिक स्कूल की छत से गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह बिल्डिंग फैसल फारुख की थी और कथित तौर पर इस क्षेत्र में दंगाई भीड़ के लिए एक ठिकाना था।

एंटी CAA हिंसा की भेंट चढ़े दलित

सबसे बुरी त्रासदियों में से एक यह है कि विनोद कुमार कश्यप जैसे दलितों ने दिल्ली में CAA विरोधी आंदोलन के नाम पर हुई हिंसा में अपनी जान गंवा दी। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के लाभार्थियों का एक बड़ा हिस्सा दलित और आदिवासी हैं, जिन्हें पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के बाद उनकी जमीन से बाहर कर दिया गया है।

वे पाकिस्तान में सबसे वंचित भील (दलित) समुदाय से हैं। शरणार्थी शिविरों में जोधपुर में रहने वाले इस समुदाय के कई लोगों को नागरिकता कानून से उम्मीद जगी है।पाकिस्तान में हिंदू (दलित) ओड जनजाति के लोगों को भी इसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। यह शर्मनाक है कि इनमें से ज्यादातर लोग अपनी महिलाओं को अपहरण और इस्लाम में धर्मांतरण से बचाने के लिए पाकिस्तान से भाग रहे हैं। अप्रैल 2020 में खबर आई थी, इसी जनजाति की दो लड़कियों को सिंध से अपहरण कर उनकी जबरन शादी और धर्म परिवर्तन कराया गया। 

यह एक सर्वोच्च विडंबना और बड़ी त्रासदी है कि विनोद कुमार कश्यप जैसे दलितों ने हिंसा उस हिंसा में अपनी जान गंवा दी, जिन्हें उन नेताओं ने हवा दी थी, जो दलितों के अधिकारों और भीम-मीम के आधार पर काम करने का दावा करते हैं। 

लेखक: (राहुल चिमुरकर बाबासाहेब अम्बेडकर दर्शन के विद्वान हैं। वे लक्ष्मीबाई कॉलेज, डीयू में पढ़ाते हैं।)