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नौसेना के लिए भारत फ्रांस से खरीद सकता है Rafale-M, जानें वायुसेना के विमान से कितने अलग होते हैं नेवी के फाइटर जेट

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी महीने फ्रांस की यात्रा (Narendra Modi France Visit) करने वाले हैं। इस दौरान भारत और फ्रांस के बीच 26 राफेल-एम विमान खरीदने के लिए समझौता हो सकता है। 26 राफेल-एम विमान नौसेना के लिए खरीदे जा रहे हैं।   

3 Min read
Author : Vivek Kumar
| Updated : Jul 12 2023, 08:19 AM IST
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Image Credit : Twitter

इन्हें भारत के दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर तैनात किया जाएगा। इससे पहले भारत ने वायुसेना के लिए फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीदे थे। इसके लिए 2016 में डील फाइनल हुआ था। फ्रांस से सभी 36 राफेल भारत को मिल गए हैं। आइए जानते हैं वायुसेना के विमान से नौसेना के विमान कितने अलग होते हैं।

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Image Credit : stockPhoto

डिजाइन और क्षमताओं के मामले में नौसेना के लिए बने लड़ाकू विमान और उसी विमान के जमीन से ऑपरेट होने वाले वर्जन में अंतर होता है। राफेल जमीन पर मौजूद एयरवेस से ऑपरेट होने के लिए बना है। वहीं, राफेल एम को विमान वाहक पोत से उड़ान भरने और उसपर लैंड करने के लिए बनाया गया है।

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Image Credit : our own

नौसेना के लड़ाकू विमान को कई कठिन चुनौतियों का सामना करना होता है। लैंडिंग के वक्त विमान को अधिक झटका लगता है। एयरक्राफ्ट कैरियर का रनवे छोटा होता है। छोटे रनवे पर विमान तेजी से रुक सके इसके लिए एरेस्ट लैंडिंग (रनवे पर लैंड करते ही तारों की मदद से विमान की रफ्तार कम करना) की जाती है।

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Image Credit : Getty

वहीं, टेकऑफ के लिए कैटापोल्ट्स (विमान को तेज रफ्तार से हवा में उछालने के लिए बना सिस्टम) या रैंप लॉन्चर की मदद ली जाती है। इससे विमान के एयरफ्रेम पर अधिक दबाव पड़ता है। इसके साथ ही विमान को लगातार खारे पानी के वातावरण में रहना पड़ता है। यह विमान के फ्रेम को कमजोड़ करता है। जमीन से ऑपरेट होने वाले लड़ाकू विमान को इस तरह की चुनौती का सामना नहीं करना होता।

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Image Credit : Getty

एयर क्राफ्ट कैरियर पर विमानों के रखने की जगह की कमी होती है। विमान को लिफ्ट की मदद से रनवे पर लाया जाता है। ऐसे में ऐसे विमान की जरूरत होती है, जिसके पंखों का फैलाव कम हो। इस जरूरत को पूरी करने के लिए नौसेना के लिए बने कई विमानों में पंखों को फोल्ड करने की सुविधा होती है। भारतीय नौसेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे MiG-29K विमान में यह सुविधा है। अरेस्टेड लैंडिंग के लिए विमान के पिछले हिस्से में हुक दिया गया है। वहीं, वायुसेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले विमानों में इनकी जरूरत नहीं होती।

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Image Credit : Twitter IAF

नौसेना के लिए बने विमान अपने एयरफोर्स के वर्जन से आकार में छोटे और हल्के होते हैं। यह खूबी इन्हें एयरक्राफ्ट कैरियर से ऑपरेट होने में मदद करती है। नौसेना के विमान को छोटे रनवे से टेकऑफ करना होता है। इसके चलते ये अपनी पूरी क्षमता जितना वजन (हथियार या इंधन) नहीं ले जा पाते। इसके चलते इनका रेंज भी वायुसेना के वर्जन से कम होता है। हवा में इंधन भरने की क्षमता से रेंज की कमी की पूरी कर ली जाती है।

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Image Credit : stockPhoto

नौसेना के लड़ाकू विमान में जहाजों और पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए अलग तरह के रडार सिस्टम लगाए जाते हैं। इसके साथ ही इनका नेविगेशन सिस्टम भी अलग होता है। वहीं, वायुसेना के लिए बने लड़ाकू विमान में हवा से हवा में होने वाली लड़ाई और जमीन पर हमला करने की क्षमता पर अधिक फोकस किया जाता है।

यह भी पढ़ें- PM Modi France Visit: भारत-फ्रांस की दोस्ती का नया दौर, आर्थिक सहयोग-रणनीतिक साझेदारी होगी मजबूत

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Image Credit : Dassault Aviation

नौसेना के विमान को लगातार खारे पानी वाले वातावरण में रहना पड़ता है। इससे विमान को तेजी से जंग लगने का खतरा रहता है। इससे निपटने के लिए विमान पर जंग से बचने वाली कोटिंग अधिक की जाती है। एयर फोर्स से विमान को नौसेना जितनी अधिक जंगरोधी कोटिंग की जरूरत नहीं होती।

यह भी पढ़ें- पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा से फ्रांसीसी कंपनियों को बड़ी उम्मीदें, रणनीतिक साझेदारी नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के लिए हो सकते हैं समझौते

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About the Author

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Vivek Kumar
विवेक कुमार। डिजिटल मीडिया में 12 साल का अनुभव। मौजूदा समय में एशियानेट न्यूज हिंदी के साथ बतौर सीनियर सब एडिटर काम कर रहे हैं। नेशनल, वर्ल्ड, ट्रेन्डिंग टॉपिक, एक्सप्लेनर, डिफेंस, पॉलिटिक्स जैसे टॉपिक में इनका इंट्रेस्ट है। इन्होंने एमएससी किया हुआ है। मूलतः ये बिहार के रहने वाले हैं।

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