Asianet News Hindi

ऐसे मिली थी इसरो को 12 लाख के खर्च में चंद्रमा की तरह दिखने वाली मिट्टी, नासा ने मांगे थे करोड़ों रुपए

चंद्रमा की सतह के बारे में जानने के लिए भारत को चंद्रमा की मिट्टी की जरूरत थी और अध्ययन के लिए करीब 60-70 टन मिट्टी की जरूरत लगती।

NASA wishes to earn crores from india on lunar soil for chandrayaan 2
Author
New Delhi, First Published Sep 7, 2019, 12:10 AM IST
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp

नई दिल्ली. चंद्रयान 2 का विक्रम लैंडर शुक्रवार की रात 1.55 बजे चंद्रमा पर उतरेगा। इसके साथ ही भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बनेगा। इससे पहले रूस, अमेरिका और चीन ने यह कारनामा किया है। लेकिन जब भारत ने इस काम के लिए नासा की मदद लेनी चाही तो वो चंद्रमा की मिट्टी के नाम पर भारत से 60-70 लाख रुपए कमाना चाहता था, जिसे इसरो ने महज 12 लाख रुपए में ही कर दिखाया। 

चंद्रमा के सतह के बारे में जानने के लिए जरूरी थी मिट्टी 

दरअसल, चंद्रमा की सतह के बारे में जानने के लिए भारत को चंद्रमा की मिट्टी की जरूरत थी और अध्ययन के लिए करीब 60-70 टन मिट्टी की जरूरत लगती। अमेरीका से भारत ने इसके लिए मदद लेनी चाही लेकिन उसने चांद की तरह दिखने वाली मिट्टी  देने के लिए भारत से 1 हजार रुपए प्रति किलो मिट्टी देने की बात कही थी। अगर इसका हिसाब लगाया जाए तो भारतीय करंसी के एक हजार रुपए के अनुमान से इसकी कीमत करीब 60-70 लाख रुपए होती वहीं, अगर ये रुपए डॉलर में हो तो इसकी कीमत करोड़ों में होगी, जिसे इसरो ने महज 12 लाख में कर दिखाया। 

ऐसे मिली थी मिट्टी

भूवैज्ञानिकों ने खोज की कि तमिलनाडु के दो गांव सीतमपोंडी और कुन्नामलाई में एरोथोसाइट की चट्टानें हैं जिनसे चंद्रमा की मिट्टी की तरह मिट्टी बनाई जा सकती है। वैज्ञानिकों ने चांद के साउथ पोल के अध्ययन के लिए यहां की मिट्टी का बंगलूरू की प्रयोगशाला में टेस्टिंग के लिए भेज दिया था। इसरो ने लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को सफलतापूर्वक चांद पर उतारने के लिए चट्टानों को जरूरत के अनुसार मिट्टी का आकार देकर आर्टिफिशियल चांद की सतह तैयार की। यानी इस मिट्टी का इस्तेमाल आर्टिफिशियल चांद की सतह बनाने में किया गया। इस मिट्टी को तैयार करने में लगभग 12 लाख का खर्चा आया।

Follow Us:
Download App:
  • android
  • ios