कोरोना महामारी को कंट्रोल करने के लिए हाईड्रॉक्सीक्लोक्वीन से इलाज की उम्मीद की जा रही है, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि मरीजों के इलाज के दौरान एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन के साथ और इसके बिना हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के इस्तेमाल से न तो उन्हें वेंटिलेटर पर भेजने का खतरा कम हुआ और न ही जान के खतरे में कमी आई है। 

नई दिल्ली. कोरोना महामारी को कंट्रोल करने के लिए हाईड्रॉक्सीक्लोक्वीन से इलाज की उम्मीद की जा रही है, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि मरीजों के इलाज के दौरान एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन के साथ और इसके बिना हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के इस्तेमाल से न तो उन्हें वेंटिलेटर पर भेजने का खतरा कम हुआ और न ही जान के खतरे में कमी आई है। यह मेड नामक जर्नल में पब्लिश एक एनालिसिस के आधार पर किया गया है। 

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जान के खतरे में कमी नहीं आई है
रिसर्च में कहा गया, अस्पताल में भर्ती कोरोना वायरस के मरीजों पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा, एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन के साथ और इसके बिना दिए जाने पर न तो वेंटिलेटर पर जाने और न ही जान के खतरे में कमी आई है।

807 मरीजों पर किया गया एक्सपेरिमेंट 
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रिसर्च में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिक भी शामिल थे। देशभर के वेटरन्स अफेयर्स मेडिकल सेंटरों में भर्ती 807 कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों के डेटा का आकलन किया गया। 

86% मरीजों को वेंटिलेटर पर रखना पड़ा 
रिसर्च में कहा गया कि 198 मरीजों को हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा दी गई और 214 मरीजों को हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और एजिथ्रोमाइसिन दोनों दवाएं दी गईं। इनमें से 86% मरीजों को वेंटिलेटर पर रखने से पहले हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दी गई, लेकिन फिर भी उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। इसके अलावा उनकी जान जाने का खतरा भी कम नहीं हुआ।