न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुस्लिम पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि राम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है। 

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीराम लला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी क्योंकि अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी ‘पूजा-सेवा’ जारी रही। ‘नियंत्रण का कानून’ तकलीफ में आए पक्ष को एक तय सीमा के भीतर अपनी ओर से मुकदमा दायर करने को कहता है। 22/23 दिसंबर, 1949 को मुख्य गुंबद के नीचे प्रतिमा रखे जाने के बाद संपत्ति जब्त कर ली गई और सुन्नी वक्फ बोर्ड को कथित रूप से उस जमीन से हटा दिया गया। उसे इस घटना के 12 साल के भीतर शिकायत दर्ज कराने का अधिकार था।

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1989 में दायर की थी री-पीटीशन

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुस्लिम पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि राम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के इस हिस्से को अपने फैसले में बरकरार रखा कि मुख्य गुम्बद के नीचे का हिस्सा भगवान राम की जन्मभूमि है। पीठ ने कहा कि यह तय करते हुए कि राम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त तो नहीं थी, हमें एक बात का ख्याल रखना होगा कि अन्य मामलों में राम लला को पक्ष नहीं बनाया गया था। 

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पीठ ने कहा कि 29 दिसंबर, 1949 में विवादित संपति की जब्ती के बावजूद महत्वपूर्ण बात यह है कि राम लला की ‘सेवा-पूजा’ कभी बंद नहीं हुई।