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सुप्रीम कोर्ट आज अपने ही ऊपर देगा फैसला, सीजेआई के दफ्तर को लेकर दायर है केस

सुप्रीम कोर्ट द्वारा आज सीजेआई का दफ्तर आरटीआई के दायरे में आएगा या नहीं इस पर फैसला सुनाया जा सकता है। इस मामले में 4 अप्रैल को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली संविधान बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

Supreme Court will give verdict on its own today, case is filed for CJI office
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New Delhi, First Published Nov 13, 2019, 9:56 AM IST
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नई दिल्ली.  देश के प्रधान न्यायाधीश के दफ्तर को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना सकता है। इस मामले में 4 अप्रैल को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली संविधान बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब सीजेआई रंजन गोगोई की आगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच दोपहर करीब 2 बजे तक इस मामले पर अपना फैसला सुना सकती है। 

दिल्ली हाईकोर्ट मे ठहराया था सही 

मुख्य सूचना आयुक्त ने आदेश में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का दफ्तर आरटीआई के दायरे में होगा। इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने 2010 में चुनौती दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे कर दिया था। फिर इस मामले को संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया गया था। इस बेंच के अन्य सदस्य जस्टिस एन वी रमण, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना हैं। जो इस मसले की सुनवाई कर रहे हैं।

कोई भी अंधेरे की स्थिति में नहीं 

इससे पूर्व प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाली बेंच ने इस मामले पर सुनवाई पूरी करते हुए कहा था कि कोई भी अपारदर्शिता की व्यवस्था नहीं चाहता, लेकिन पारदर्शिता के नाम पर न्यायपालिका को नष्ट नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा था, 'कोई भी अंधेरे की स्थिति में नहीं रहना चाहता या किसी को अंधेरे की स्थिति में नहीं रखना चाहता। आप पारदर्शिता के नाम पर संस्था को नष्ट नहीं कर सकते। 

हाईकोर्ट ने दिया था यह फैसला

बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 जनवरी 2010 को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई कानून के दायरे में आता है। कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक स्वतंत्रता न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उस पर एक जिम्मेदारी है। 88 पन्नों के फैसले को तब तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन के लिए निजी झटके के रूप में देखा गया था, जो आरटीआई कानून के तहत न्यायाधीशों से संबंधित सूचना का खुलासा किए जाने के विरोध में थे। हाईकोर्ट ने शीर्ष अदालत की इस दलील को खारिज कर दिया था कि सीजेआई कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाए जाने से न्यायिक स्वतंत्रता ‘बाधित’ होगी। जिसके बाद इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। जिस पर आज फैसला सुनाया जा सकता है। 
 

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