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इस जवान ने अकेले उड़ा दिए थे पाकिस्तान के 10 टैंक, 6 महीने के अंदर हासिल किया था परमवीर चक्र

अरुण ने लड़ाई में पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु सेना के 10 टैंक नष्ट किए थे। और महज 21 वर्ष की आयु में वे वीरगति को प्राप्त हो गए थे। दुश्मन के सामने बहादुरी के लिए भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र मरणोपरान्त प्रदान किया गया था।

This jawan had blown 10 tanks of Pakistan alone, achieved Paramveer Chakra within 6 months KPB
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New Delhi, First Published Jan 23, 2020, 8:40 PM IST
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नई दिल्ली. 26 जनवरी का दिन पूरे देश में हर साल बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इसी दिन साल 1950 में भारत ने अपने संविधान को अंगीकृत किया था। रविवार के दिन भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस मना रहा होगा। हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से बाहर निकालकर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाने में कई महान नेताओं और स्वतंक्षता सेनानियों का योगदान रहा है। आजाद होने के बाद भी भारत पर जब भी संकट के बादल आए हैं। देश के वीरों ने अपनी जान की कुर्बानी देकर देश की रक्षा की है। आज हम आपको ऐसे ही एक वीर सपूत के बारे में बता रहे हैं, जिसने 1971 के युद्ध में अकेले ही पाकिस्तान के 10 टैंक उड़ा दिए थे। 

21 साल की उम्र में हो गए थे शहीद 
14 अक्टूबर को जन्म लेने वाले सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट अरुण खेत्ररपाल वो वीर जवान थे जिन्होंने पाकिस्तान से साल 1971 में हुए युद्ध में देश के लिए योगदान दिया था। अरुण ने लड़ाई में पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु सेना के 10 टैंक नष्ट किए थे। और महज 21 वर्ष की आयु में वे वीरगति को प्राप्त हो गए थे। दुश्मन के सामने बहादुरी के लिए भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र मरणोपरान्त प्रदान किया गया था। 

रेडियो पर आई खबर कभी नहीं लौटेगा बेटा 
अरुण खेत्रपाल की मां ने एक बार बताया था कि उन्हें लड़ाई में अरुण की बहादुरी के बारे में जानकारी मिल रही थी। आकाशवाणी ने 16 दिसंबर, 1971 को जंग में भारत की विजय की जानकारी देश को दी। बाकी देश की तरह खेत्रपाल परिवार भी खुश था। लेकिन तभी परिवार को पता चला कि अरुण अब कभी घर नहीं आएंगे। वह पाक सेना से लोहा लेते हुए 16 दिसंबर, 1971 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनके सम्मान में एनडीए के परेड ग्राउंड का नाम खेत्रपाल ग्राउंड रखा गया है। इंडियन मिलिट्री अकैडमी में एक ऑडिटोरियम और गेट्स उनके नाम पर है। खेत्रपाल ऑडिटोरियम का निर्माण 1982 में हुआ था। यह उत्तरी भारत के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में से एक है। यहां अरुण खेत्रपाल की प्रतिमा और उनके बहादुरी भरे कारनामों का शिलालेख पर उल्लेख है।

पिता से मिला था देश के लिए लड़ने का जज्बा 
अरुण खेत्ररपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) एम एल खेत्ररपाल भारतीय सेना में कोर ऑफ इंजीनियर्स अधिकारी थे। लॉरेंस स्कूल सनवार में जाने के बाद उन्होंने खुद को एक सक्षम छात्र और खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया था। खेत्ररपाल जून 1967 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में शामिल हुए। वह फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन से संबंधित थे जहां वह 38वें पाठ्यक्रम के स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन थे। वह बाद में भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल हो गए। 13 जून 1971 में खेतपाल को 17 पूना हार्स में नियुक्त किया गया था।

6 महीने की सेवा में जीता परमवीर चक्र 
खेत्ररपाल ने अपना सैन्य जीवन 13 जून 1971 को शुरू किया था और 16 दिसम्बर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 17 पूना हार्स को भारतीय सेना के 47वीं इन्फैन्ट्री ब्रिगेड की कमान के अंतर्गत नियुक्त किया गया था। संघर्ष की अवधि के दौरान 47वीं ब्रिगेड शकगढ़ सेक्टर में ही तैनात थी। 6 माह के अल्प सैन्य जीवन में ही इन्होने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। 

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