कृषि कानूनों को लेकर किसानों का विरोध प्रदर्शन जारी है। एक हफ्ते में दो बार सरकार ने पत्र लिखकर किसानों से बातचीत की पहल की। लेकिन किसानों का कहना है कि सरकार नया प्रपोजल नहीं भेज रही है। हालांकि आज किसान तय करेंगे कि आगे की क्या रणनीति होगी और वे सरकार से कब और कैसे बात करेंगे? लेकिन ऐसे में समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर सरकार और किसानों के बीच बातचीत कहां जाकर अटक जा रही है?

नई दिल्ली. कृषि कानूनों को लेकर किसानों का विरोध प्रदर्शन जारी है। एक हफ्ते में दो बार सरकार ने पत्र लिखकर किसानों से बातचीत की पहल की। लेकिन किसानों का कहना है कि सरकार नया प्रपोजल नहीं भेज रही है। हालांकि आज किसान तय करेंगे कि आगे की क्या रणनीति होगी और वे सरकार से कब और कैसे बात करेंगे? लेकिन ऐसे में समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर आंदोलन के 30 दिन हो गए, 6 दौर की बातचीत हो गई, फिर भी सरकार और किसानों के बीच बातचीत कहां जाकर अटक जा रही है?

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सरकार की चिट्ठी में क्या है?

  • सरकार ने चिट्ठी में स्पष्ट किया है कि वे कृषि कानूनों को वापस नहीं लेंगे। हां कानूनों पर बातचीत कर संशोधन किया जा सकता है।
  • एमएसपी को लेकर सरकार ने कहा कि वे लिखित में आश्वासन देने के लिए तैयार हैं।
  • सरकार ने अपनी चिट्ठी में स्पष्ट किया है कि नए कृषि कानूनों का एमएसपी से मतलब नहीं है। ऐसे में नए कानून का एमएसपी पर कोई असर नहीं पड़ेगी।
  • चिट्ठी में एमएसपी पर किसी तरह की नई डिमांड रखने से सरकार ने आपत्ति जताई है। सरकार का कहना है कि चर्चा की जा सकती है।
  • सरकार ने कहा कि विद्युत संशोधन अधिनियम, पराली जलाने के कानूनों को लेकर चर्चा की जा सकती है।

किसानों की मांग क्या है?

  • किसानों का साफ-साफ कहना है कि कृषि कानूनों में संशोधन नहीं, बल्कि उसे वापस लिया जाए।
  • एमएसपी को लेकर किसानों का कहना है कि लिखित आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे कानून में शामिल किया जाए। 
  • किसान एमएसपी से कम मूल्य की खरीदी को दंडनीय अपराध के दायरे में लाने की मांग कर रहे हैं।
  • किसान धान-गेहूं की फसल की सरकारी खरीद को सुनिश्चित करने की मांग भी कर रहे हैं।