छत्तीसगढ़ के एक गांव में पादरी के शव को दफनाने को लेकर विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट के आदेश पर तीन हफ्ते बाद शव दफनाया गया। गांव में तनाव का माहौल।

जगदलपुर न्यूज: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में 7 जनवरी से शवगृह में रखे पादरी के शव को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दफना दिया गया। तीन सप्ताह तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद पादरी के बेटे रमेश बघेल ने अपने पिता के शव को उनके पैतृक स्थान छिंदवाड़ा गांव से करीब 25 किलोमीटर दूर करकापाल गांव में एक ईसाई कब्रिस्तान में दफना दिया। विवाद की शुरुआत 7 जनवरी को छिंदवाड़ा गांव में पादरी सुभाष बघेल की उम्र संबंधी बीमारियों से मौत के बाद हुई थी।

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कोर्ट ने सोमवार को पादरी के अंतिम संस्कार को लेकर विभाजित फैसला सुनाया और उन्हें पड़ोसी गांव में ईसाइयों के लिए निर्धारित स्थान पर दफनाने का आदेश दिया। इस दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि पादरी को परिवार की निजी कृषि भूमि पर दफनाया जाना चाहिए, लेकिन जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा ने कहा कि शव को छत्तीसगढ़ में उनके गांव से दूर निर्धारित स्थान पर दफनाया जाना चाहिए। पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता के पिता के अंतिम संस्कार के स्थान को लेकर सदस्यों में आम सहमति नहीं थी।"

पादरी का शव सात जनवरी से मुर्दाघर में रखा हुआ था और पीठ ने शीघ्र और सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश जारी करने पर सहमति जताई। अदालत ने अपीलकर्ता को अपने पिता का अंतिम संस्कार करकापाल गांव के कब्रिस्तान में करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने रमेश बघेल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

हाईकोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती

याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने रमेश की उस याचिका का निपटारा कर दिया था जिसमें उसने अपने पिता के शव को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने का अनुरोध किया था। फैसले के बारे में पादरी के बेटे रमेश बघेल ने कहा, "मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करता हूं। मैं फैसले से परे नहीं जा सकता।

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मेरे साथ अन्याय हुआ

बघेल ने कहा, "यह मेरे साथ अन्याय है। करीब डेढ़-दो साल पहले गांव में सब कुछ सामान्य था, लेकिन अचानक कुछ लोगों ने गांव वालों को भड़का दिया, जिन्होंने मेरे पिता को गांव में दफनाने पर आपत्ति जताई। यह मेरे संवैधानिक अधिकारों का हनन था। मैं उनकी आपत्ति के खिलाफ कोर्ट गया। यह मेरी जीत या हार का सवाल नहीं है। यह मानवता की हार है। रमेश ने कहा कि गांव वालों ने ईसाई समुदाय के लोगों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है, उनकी दुकानों से सामान खरीदना बंद कर दिया है और उनके खेतों में काम करना बंद कर दिया है।

बघेल ने दावा किया था कि छिंदवाड़ा गांव में एक कब्रिस्तान है, जिसे ग्राम पंचायत ने शवों को दफनाने और दाह संस्कार के लिए मौखिक रूप से आवंटित किया है। कब्रिस्तान में आदिवासियों को दफनाने, हिंदू धर्म के लोगों को दफनाने या दाह संस्कार करने के अलावा ईसाई समुदाय के लोगों के लिए अलग से जगह तय की गई थी।

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