Raksha Bandhan पर ब्राह्मण धारण करते हैं नया यज्ञोपवित, नदी के तट पर करते हैं ये खास काम

Published : Aug 20, 2021, 09:45 AM ISTUpdated : Aug 20, 2021, 01:11 PM IST
Raksha Bandhan पर ब्राह्मण धारण करते हैं नया यज्ञोपवित, नदी के तट पर करते हैं ये खास काम

सार

श्रावणी पूर्णिमा यानी सावन मास (Sawan month) की पूर्णिमा तिथि पर रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये उत्सव 22 अगस्त, रविवार को है। इस पर्व से जुड़ी और भी कई परंपराएं और मान्यताएं हैं। 

उज्जैन. इस बार रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) का पर्व  22 अगस्त, रविवार को है। इस पर्व से जुड़ी कई परंपराएं और मान्यताएं हैं। इस दिन ब्राह्मणों द्वारा नदी के तट पर एक विशेष कार्य किया जाता है, इसे श्रावणी उपाकर्म कहते हैं। इसे पुण्य करने का दिन कहा जाता है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि इसी दिन से वेदों का पाठ करना शुरू करते थे। इस दिन स्नान और आत्मशुद्धि कर पितरों और खुद के कल्याण के लिए आहुतियां दी जाती हैं। इस दिन पेड़-पौधे लगाने का भी खास महत्व होता है। आगे जानिए कैसे किया जाता है श्रावणी उपाकर्म…

- श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प।
- गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नान कर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पाप कर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं।
- स्नान के बाद ऋषि पूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
- यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्मसंयम का संस्कार है। इस दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं।
- इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।
- उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है।
- जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है।
- इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा पर ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं।
- प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।

पौधारोपण का भी खास महत्व
श्रावणी उपाकर्म के बाद वृक्षारोपण भी किया जाता है। वृक्ष परोपकार के प्रतीक हैं, जो बिना कुछ मांगे हमको शीतल छाया, फल और हरियाली प्रदान करते हैं। मानव जीवन के ये करीब के सहयोगी हैं और सदैव हमारी सेवा में तत्पर रहते हैं। अतः हमें भी इनकी सेवा तथा देखभाल करनी चाहिए। 

सामूहिक कल्याण की भावना
श्रावणी पर्व से अपने जीवन को सत्पथ पर बढ़ाने, रक्षासूत्र द्वारा नारी के प्रति पवित्रता का भाव रखने तथा वृक्षारोपण द्वारा इन भावनाओं को क्रियाओं में परिणत करने का संकल्प लिया जाता है जो कि इस पर्व का प्राण है। इसे हम सबको पूरा करना चाहिए। इसी में हमारी पर्व परंपरा के साथ-साथ सामूहिक कल्याण निहित है।

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