वैशाख अमावस्या आज: लॉकडाउन के कारण न कर पाएं तीर्थ स्नान तो ये उपाय करें, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

Published : May 11, 2021, 10:26 AM ISTUpdated : May 11, 2021, 10:29 AM IST
वैशाख अमावस्या आज: लॉकडाउन के कारण न कर पाएं तीर्थ स्नान तो ये उपाय करें, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

सार

आज (11 मई, मंगलवार) को वैशाख मास की अमावस्या है। इसे पितृ अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन पितरों की पूजा का विशेष महत्व है।

उज्जैन. वैशाख अमावस्या पर नदी में स्नान कर दान करने का भी खास महत्व है, इस बार लेकिन लॉक डाउन के कारण नदियों में नहाना संभव नहीं हो सकेगा। इसलिए अपने घर में ही पवित्र नदीयों के जल से नहाकर वैशाख अमावस्या का पूरा फल प्राप्त किया जा सकता है। आगे जानिए घर पर कैसे करें स्नान…

स्नान-दान और व्रत की विधि
- पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र के अनुसार, वैशाख अमावस्या पर सूर्योदय से पहले उठें। फिर नहाने के पानी में नर्मदा, गंगा या किसी भी पवित्र नदी का जल मिला लें।
- साथ में थोड़े से तिल भी डाल लें। इस पानी से नहाते हुए 7 पवित्र नदियों, गंगा, युमना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी को प्रणाम करें।
- महामारी या विपरित परिस्थितियों के दौरान ऐसा करने से तीर्थ स्नान का फल मिलता है और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
- 11 मई को वैशाख अमावस्या भरणी नक्षत्र में शुरू होगी। इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। ये ग्रह सुख और समृद्धि देने वाला है।
- शुक्र के प्रभाव से अमावस्या तिथि पर पितृ शांति और रोगनाश के लिए किए गए दान एवं पूजा का विशेष फल प्राप्त होगा।

ये है वैशाख अमावस्या की कथा
- वैशाख अमावस्या के महत्व से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। एक बार उन्होंने किसी महात्मा के मुख से सुना कि कलियुग में भगवान विष्णु के नाम स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी काम में नहीं है।
- इसके बाद धर्मवर्ण ने सांसारिक जीवन छोड़ दिया और संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे। एक दिन घूमते हुए वे पितृलोक पहुंचें। वहां उनके पितर बहुत कष्ट में थे। पितरों ने बताया कि ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई नहीं है।
- पितरों ने कहा अगर तुम वापस जाकर गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो और साथ ही वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करो, तो हमें राहत मिल सकती है।
- धर्मवर्ण ने उन्हें वचन दिया कि वह उनकी ये इच्छा पूरी करेंगे। इसके बाद उन्होंने संन्यासी जीवन छोड़कर फिर से सांसारिक जीवन अपनाया और वैशाख अमावस्या पर विधि-विधान से पिंडदान कर अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।

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