गोल्ड मेडलिस्ट पिता को इस हालत में देखकर बेटों ने भी छोड़ दी तैराकी, देश के लिए कौन लाएगा मेडल?

Published : Nov 22, 2019, 02:00 PM ISTUpdated : Nov 22, 2019, 02:06 PM IST
गोल्ड मेडलिस्ट पिता को इस हालत में देखकर बेटों ने भी छोड़ दी तैराकी, देश के लिए कौन लाएगा मेडल?

सार

लगातार तीन साल बिहार को दो स्वर्ण पदक समेत आठ बार सम्मान दिलाया, अब हाथ की चाय पहचान बन गई है पहचान

पटना: बिहार को राष्ट्रीय स्तर की तैराकी प्रतियोगिताओं में आठ पदक जीतकर देने वाले खिलाड़ी कि भूखे मरने की नौबत आ गई थी। राजधानी के नया टोला नुक्कड़ पर 1998 से चाय दुकान चला रहे नेशनल तैराक गोपाल प्रसाद यादव का दर्द कुछ यूं छलक पड़ा उन्होंने कहा कि मेरे बेटे सोनू कुमार यादव और सन्नी कुमार यादव, दोनों ही बेहतरीन तैराक हैं, लेकिन वे मेरी तरह 'चायवाला' बनकर नहीं रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने तैराकी छोड़ दी।'

तीन साल बिहार को दो स्वर्ण पदक दिलाए 

गोपाल कहते हैं, 1987 से 89 तक लगातार तीन साल बिहार को दो स्वर्ण पदक समेत आठ बार सम्मान दिलाया। 1990 में प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाया, क्योंकि खाने के लिए मात्र दस रुपये मिलते थे। इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आयोजनों में वे शरीक हुआ। चौथे, पांचवें स्थान पर रहे। इसका कारण उन्होंने यह बताया कि हम गंगा में तैराकी करते थे और वहां स्विमिंग पूल मिलता था। 

उन्होंने कहा कि 1974-75 में  तैराकी के लिए 1500 रुपये दिए जाते थे। 1990 में घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई, तब सरकारी नौकरी के लिए प्रयास शुरू किया। पोस्टल विभाग की नौकरी के लिए संत माइकल स्कूल में इंटरव्यू देने गया मगर वहां के अधिकारी ने उन्हें बाहर उठाकर फेंक दिया। गोपाल नें बताया कि वो 1998 से नया टोला के मुहाने पर चाय का स्टॉल लगा रहें है। दो-चार पैसे आने के बाद उन्हें दो वक्त का खाना मिलने लगा।

लालू प्रसाद भी दुकान पर आए

गोपाल कहते हैं, दर्जनों पत्र- पत्रिकाओं में मेरी व्यथा पर लेख छपे। जब मैंने चाय दुकान खोली, तब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे। वे लाल बत्ती वाली गाड़ी से मेरी दुकान पर आए और मुझे उसी गाड़ी पर बैठकर सचिवालय ले गए। मुझसे पूछा गया कि कहां तक पढ़े हो। बताया, नौवीं पास हूं। जवाब मिला, आपको नौकरी का पत्र भेजा जाएगा। कुछ महीने बाद तत्कालीन खेल मंत्री भी आए। फिर आश्वासन मिला पर आज तक नौकरी नहीं मिली।

रविवार को देते हैं तैराकी का मुफ्त प्रशिक्षण

मेरी हालत के लिए तैराकी नहीं, बल्कि सरकारें दोषी हैं। दोनों बेटों को तैराकी सिखाया। सन्नी (छोटा बेटा) में नेशनल स्तर पर खेलने की क्षमता है, लेकिन, मेरा हाल देखकर दोनों ने तैराकी छोड़ दी। बड़ा बेटा सोनू कुरियर कंपनी में काम करता है। सन्नी प्रिंटिंग के काम से जुड़ा है। एक बेटी है, जिसकी शादी करनी बाकी है। मैंने तैराकी नहीं छोड़ी। आज भी हर रविवार को मुफ्त में तैराकी का प्रशिक्षण देता हूं।

अब चाय ही है पहचान

गोपाल की चाय दुकान पर आने वाले ग्राहक पहले उनके आठों पदकों को निहारते हैं, जिन्हें उन्होंने स्टॉल के ऊपर टांग रखा है। पीछे नेशनल तैराक का बड़ा बैनर लगा है। इस महंगाई में भी वह पांच रुपये प्रति गिलास चाय पिलाते हैं। गोपाल कहते हैं, मैं नाम कमाने का शौकीन हूं। तैराकी ने नाम दिलाया, अब मेरे हाथ की बनी चाय पहचान बन गई है।
 

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