
Constitutional Rights from Birth to Death: मानव जीवन में जन्म से लेकर जीवन के अंतिम पड़ाव तक कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं। हमारा संविधान भी इन जीवन के हर चरण में मिलने वाले अधिकारों की रक्षा करता है और उसे और खूबसूरत बनाता है। यानी इंसान के गर्भ में आने के क्षण से लेकर मृत्यु तक, संविधान हर मोड़ पर उसकी गरिमा, सुरक्षा और स्वतंत्रता का ख्याल रखता है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 26 नवंबर संविधान दिवस 2025 के मौके पर जानिए कि मानव जीवन के महत्वपूर्ण चरणों से संविधान के 16 अधिकार किस तरह जुड़े हैं।
जीवन की पहली सीढ़ी यानी गर्भाधान से ही संविधान जीवन के संरक्षण को सबसे महत्वपूर्ण मानता है। जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है और इसी वजह से माता और गर्भ में पल रहे बच्चे, दोनों की सेहत और सुरक्षा कानून द्वारा सुरक्षित मानी गई है। यह संदेश भी दिया गया है कि जीवन को सम्मान और समानता का अधिकार जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है।
स्त्री हो या पुरुष, हर इंसान गरिमा के साथ जी सके, यह संवैधानिक हक है। इस चरण में बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और उनकी हैसियत की बराबरी सुनिश्चित करना संविधान का अहम दायित्व है। किसी भी तरह का भेदभाव कानून के खिलाफ है।
गर्भकाल के दौरान महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य, देखभाल और सुरक्षा मिले, यह सिर्फ सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार भी है। सरकार से लेकर स्वास्थ्य संस्थान तक यह दायित्व है कि हर गर्भवती महिला को जरूरी सुविधाएं मिलें।
जन्म लेते ही बच्चे को जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य का अधिकार मिलता है। संविधान साफ कहता है कि किसी भी नवजात के साथ जाति, धर्म या आर्थिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
जन्म के बाद बच्चे को नाम, पहचान और नागरिकता मिलना उसका बुनियादी अधिकार है। पहचान सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि कानून द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकार है, जो व्यक्ति को पूरी जिंदगी सुरक्षा और सम्मान देता है।
जैसे बच्चे धीरे-धीरे बाहर की दुनिया में कदम रखना सीखते हैं, वैसे ही संविधान हर नागरिक को आने-जाने, अपनी पसंद की जगह रहने और कहीं भी घूमने-फिरने का अधिकार देता है। यह स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का अहम हिस्सा है।
संविधान यह सुनिश्चित करता है कि हर नागरिक को भोजन, पोषण और स्वस्थ जीवन मिले। भूख, कुपोषण और भोजन की कमी से लड़ना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
संविधान नागरिकों को साफ-सुथरा, प्रदूषण-मुक्त और स्वास्थ्य के लिए अनुकूल वातावरण देने का निर्देश देता है। पर्यावरण संरक्षण भी नागरिक अधिकारों का हिस्सा है।
संविधान 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। संविधान हर बच्चे को शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार देता है। सिर्फ स्कूल की पढ़ाई ही नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और सीखने की आजादी भी इसी अधिकार में शामिल है।
सीखने की शुरुआत के साथ ही यह भी जरूरी है कि शिक्षा में किसी तरह का भेदभाव न हो। संविधान कहता है कि हर वर्ग, हर समुदाय और हर बच्चे को समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि वह अपनी क्षमता के हिसाब से आगे बढ़ सके।
संविधान हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों को खुलकर रखने और वैज्ञानिक सोच को अपनाने की आजादी देता है।
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शिक्षा पूरी होने के बाद संविधान भी यही कहता है कि अधिकारों के साथ नागरिकों के कर्तव्य भी होते हैं, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाना कानून की मूल भावना है।
विवाह जैसे जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर संविधान यह सुनिश्चित करता है कि विवाह में दोनों पक्षों को समान अधिकार मिलें। किसी भी प्रकार की हिंसा, दहेज, भेदभाव या असुरक्षा कानून के दायरे में अपराध माना जाता है। शादी में स्वतंत्रता और सुरक्षा दोनों आवश्यक हैं।
उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति समाज और राष्ट्र के प्रति अपने बड़े कर्तव्यों को निभाता है। संविधान नागरिकों को न सिर्फ न्याय पाने का अधिकार देता है बल्कि उन्हें न्याय के लिए खड़ा होने और देशहित में योगदान देने की भी प्रेरणा देता है।
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संविधान हर नागरिक को विचारों, आस्था, धर्म और मान्यताओं को चुनने और उन्हें व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता देता है। कोई भी व्यक्ति अपने विचारों को खुलकर रख सकता है, बशर्ते वह कानून का उल्लंघन न करे।
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जीवन का अंतिम संस्कार संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा माना गया है। किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार और सम्मान की रक्षा करना मानवाधिकारों के दायरे में आता है।
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