बिहार का वो शख्स जिसने सैकड़ों गरीब बच्चों की बदली तकदीर, देशभर में हर कोई पहचानता है चेहरा

Published : Oct 23, 2020, 07:06 PM IST

पटना। आनंद कुमार अन्य लोगों की तरह एक सामान्य इंसान हैं। लेकिन उन्होंने अन्य लोगों से बिल्कुल अलग और बहुत ही असाधारण काम किए। आज उसी काम की वजह से न सिर्फ बिहार बल्कि दुनियाभर में तमाम लोग उन्हें बहुत सम्मान देते हैं। आनंद कुमार पेशे से टीचर हैं जिन्होंने अब तक सैकड़ों गरीब बच्चों को पढ़ाकर बेहतर जिंदगी जीने लायक बनाया। बिहार के इस शख्स को सुपर-30 के लिए जाना जाता है। एक ऐसा संस्थान जिसने दर्जनों सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को इतना काबिल बना दिया कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों में दाखिला पाया और आज बेहतर जिंदगी जी रहे हैं।   

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बिहार का वो शख्स जिसने सैकड़ों गरीब बच्चों की बदली तकदीर, देशभर में हर कोई पहचानता है चेहरा

आनंद कुमार गणितज्ञ हैं। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को फ्री में शिक्षा देने की वजह से उनका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हुआ है। टाइम पत्रिका ने सुपर 30 को बेस्ट ऑफ एशिया 2010 की सूची में स्थान दिया। 2010 में इंस्टिट्यूट ऑफ रीसर्च एंड डॉक्युमेंटेशन इन सोशल साइंसेस द्वारा एस रामानुजन पुरस्कार मिला। आनंद कुमार को उनके काम की वजह से भी देश में तमाम तरह के सम्मान से नवाजा गया। 
 

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हालांकि आनंद का ये मुकाम उनके अपने संघर्षों की वजह से है। इनका जीवन बेहद गरीबी में गुजरा। खराब आर्थिक हालात की वजह से आनंद मनचाही पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए। घर की हालत इतनी खराब थी कि उन्हें पढ़ाई के साथ घर चलाने के लिए पापड़ तक बेंचने पड़े। आनंद के पिता भारतीय डाक विभाग में क्लर्क थे। निजी विद्यालयों के अधिक खर्चों के कारण उनके उनकी पढ़ाई हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में हुई। आनंद को बचपन से ही गणित से बेहद लगाव था। ग्रैजुएशन के बाद आनंद कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए सिलेक्ट हो गए थे। मगर पिता की अचानक मृत्यु और घर की खराब बिगड़ी हालत की वजह से उनका सपना पूरा नहीं हो सका। 

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पिता के निधन के बाद आनंद को काफी संघर्ष करने पड़े। दिनभर पढ़ाई और शाम को मां के बनाए पापड़ बेचते थे। आनंद ने पैसे कमाने के लिए 1992 में गणित पढ़ाना शुरू किया। 5000 रुपए किराए पर उन्होंने अपने संस्थान रामानुजन स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स की स्थापना की। कुछ ही दिनों में आनंद की ख्याति बढ़ने लगी। कई छात्र उनसे पढ़ने के लिए आने लगे। लेकिन 2002 में आनंद ने वो काम शुरू किया जिसकी वजह से आज दुनिया उन्हें सम्मान देती है।

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दरअसल, 2002 में पैसे के अभाव में आईआईटी जैसे संस्थान में दाखिले की तैयारी न कर पाने वाले गरीब छात्रों के लिए आनंद ने सुपर 30 प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के लिए आनंद सामाजिक आर्थिक रूप से कमजोर 30 बच्चों को आईआईटी की फ्री तैयारी कराते हैं। आनंद की मेहनत रंग लाई। 

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कई मर्तबा लगातार सुपर 30 प्रोग्राम के बच्चों ने आईआईटी जैसी मुश्किल परीक्षा को क्रैक किया। जाहिर सी बात है आईआईटी जैसे संस्थानों में संसाधनहीन बच्चों की इस उपलब्धि की वजह से सुपर 30 और आनंद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। दुनियाभर की मीडिया ने आनंद के करिश्मे को प्रमुखता से प्रसारित किया। उनके ऊपर शॉर्ट फिल्में बनी। तमाम संस्थाओं ने सुपर 30 को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संस्थान बताया। 

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2010 में बिहार सरकार ने भी आनंद के काम की वजह से उन्हे राज्य के सर्वोच्च पुरस्कार "मौलाना अबुल कलाम आजाद शिक्षा पुरस्कार" से सम्मानित किया। दुनियाभर के कई देशों ने भी आनंद को सम्मानित किया। आनंद कुमार पर "सुपर 30" टाइटल से बॉलीवुड में बायोपिक भी बनी। इस फिल्म ने आनंद के काम को देश दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया। 
 

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