पानी बचाने के लिए आज भी पालन होता है इस अनूठी परंपरा का, अमावस को मौन रहकर दो गांवों के लोग खोदते हैं 'जोहड़'

Published : May 31, 2022, 04:46 PM ISTUpdated : May 31, 2022, 04:47 PM IST

सीकर. देश में गर्मी के दिनों में पानी कमी होना आम बात है क्योकि जलस्तर नीचे गिर जाता है और जहां बरसात कम होती है वहां पानी की कमी पूरे साल ही बनी रहती है। ऐसे में पानी बचाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें कई योजनाएं व अभियान चलाती है। जिनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट सरकारी ऑफिसों के कागजों व फॉर्मेलिटी में ही दम तोड़ देते है। लेकिन, राजस्थान के सीकर जिले के दो गांव कोलीड़ा व तारपुरा में जल संरक्षण (water conservation) की एक ऐसी परंपरा है जो सरकारी अभियानों से भी ज्यादा कारगर है। ये परंपरा ज्येष्ठ माह की तपती गर्मी में आने वाली अमावस्या को जोहड़ (कच्चा तालाब) खोदने की है। जिसमें हर घर का सदस्य मौन होकर अपना योगदान देता है। बाद में यही जोहड़ जब बरसात के पानी से भर जाता है तो गांव के लिए वरदान साबित हो जाता है।

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पानी बचाने के लिए आज भी पालन होता है इस अनूठी परंपरा का, अमावस को मौन रहकर दो गांवों के लोग खोदते हैं 'जोहड़'

मौन होकर होती है खुदाई

कोलीड़ा व तारपुरा गांव में पानी बचाने की ये परंपरा पीढिय़ों से निभाई जा रही है। जेष्ठ महीने की अमावस को इन गांवों के लोग सुबह जल्दी उठ जाते हैं। इसके बाद मौन रहकर जोहड़ (कच्चे तालाब) की मिट्टी खोदने चले जाते हैं। जब तक खुदाई का काम चलता है तब तक सब मौन ही रहते हैं। जरूरी बात हो तो भी इशारों में ही की जाती है।

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 सात परात मिट्टी खोदना जरूरी
 
दोनों गांवों की परंपरा के अनुसार हर घर के सदस्य को जोहड़ की खुदाई में सहभागी बनना होता है। जिनके लिए कम से कम सात परात मिट्टी की खुदाई की अनिवार्यता होती है। मौन होकर सात परात मिट्टी खोदने के बाद वह घर लौट सकता है। जिसके बाद ही मौन व्रत भंग होगा।

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संत की सीख से चली परंपरा

दोनों गांव में ये परंपरा सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही है। जिसके पीछे एक संत की सीख का कारण बताया जाता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले गांव में लोग छप्पर व झूंपों में रहते थे। जिनमें अक्सर आग लग जाने पर लोग बेघर हो जाते थे। ऐसे में एक संत ने ग्रामीणों को यह सीख दी कि अमावस को गांव के हर घर के सदस्य सूर्य उगने से पहले उठकर मौन व्रत के साथ जोहड़ खोदे। ताकि उसमें जमा हुआ पानी गांव की आग व प्यास बुझाने के काम आए। तभी से ये परंपरा चल रही है।

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सूर्य निकलने से पहले की जाती खुदाई

ग्रामीणों का कहना है कि सूर्योदय से पहले मौसम ठंडा होने से मिट्टी खोदते समय गर्मी की परेशानी भी कम रहती है और मौन रहने से बातों में भी समय जाया नहीं होता साथ ही न बोलने से शरीर की एनर्जी काम में लगती है बेवजह की बातों में नहीं। 

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जोहड़ नहीं तो जाव में खोदी मिट्टी

जिस तरह से देश में जनसंख्या बढ़ती जा रही है जिसके कारण कई रीति रिवाज जगह की कमी के कारण खत्म होने की कगार पर है। दोनो गांव की ये परंपरा भी अब बढ़ती आबादी का शिकार हो रही है। जिसके चलते गांव में अब जोहड़ भूमि नहीं बची है। लोग उनमें भी अब घर बना कर रहने लगे है। पर परंपरा का पालन करना था, लिहाजा सोमवार को अमावस पर ग्रामीणों ने इस बार सरकारी स्कूल के जाव में मिट्टी की खुदाई कर इस परंपरा का पालन किया।

 

तारपुरा की सरपंच संतरा देवी का कहना है- कोलीड़ा और तारपुरा गांव में जल संरक्षण के लिए अमावस पर जोहड़ खोदने की प्राचीन परंपरा है। जिसमें हर परिवार का कम से कम एक सदस्य सात परात मिट्टी की खुदाई करता है। इस बार भले ही जोहड़ के लिए जगह नहीं मिली फिर भी परंपरा को निभाने के लिए स्कूल की जमीन चुन कर कार्यक्रम किया गया।
 

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