
चेन्नईः तमिलनाडु का तिरुपुर वर्ल्ड लेवल पर होजरी फैब्रिक निर्माण केंद्र के लिए फेमस है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि तिरुप्पुर सिर्फ फैब्रिक के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन से इस जगह के तार जुड़ते हैं। उसी कड़ी का सबसे शानदार प्रतीक ओके एसआर कुमारस्वामी मुदलियार हैं, जिसे "कोडी कथा कुमारन" के नाम से जाना जाता है। उन्होंने जान देकर तिरंगे की रक्षा की थी।
बचपन से ही वे राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रति आकर्षित थे। उनका जन्म इरोड के पास चेन्निमलाई में एक गरीब बुनकर परिवार में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण पांचवीं कक्षा से आगे वे पढ़ ना सके। लेकिन बाद के दिनों में कुमारन ने देशबंधु युवा संघ का गठन किया। वे चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युवा एक साथ आएं। वे गांधी जी के प्रशंसक भी थे।
ब्रिटिश सरकार ने रैलियों पर लगाया था प्रतिबंध
बात दिसंबर 1931 की है। लंदन में आयोजित सेकंड गोलमेज कॉन्फ्रेंस सफल नहीं हो सका था। नेशनल मूवमेंट द्वारा उठाई गई अधिकांश मांगों को खारिज कर दिया गया था। कांग्रेस ने इसका पुरजोर विरोध किया। दमनकारी नीतियों के साथ ब्रिटिश सरकार ने इस विरोध पर तुरंत पलटवार किया। इस दौरान सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। नेशनल फ्लैग ले जाना भी प्रतिबंधित था। जवाहरलाल नेहरू को इलाहाबाद से बाहर नहीं जाने का आदेश दिया गया था। नेहरू ने इस आदेश को नहीं माना और गांधी जी को लेने बंबई चले गए।
जेल में गांधी जी का अनशन
आदेश ना मानने के कारण नेहरू जी को गिरफ्तार कर लिया गया और नानी जेल में दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। गांधी जी को यह सब ठीक ना लगा। उन्होंने उसी वक्त से आंदोलन शुरू कर दिया। यह आंदोलन उस वक्त तक के लिए किया गया, जब तक सभी दमनकारी नीतियों को वापस नहीं ले लिया गया। महात्मा गांधी को 4 जनवरी की सुबह बंबई से गिरफ्तार कर लिया गया और यरवदा जेल भेज दिया गया। गांधी जी ने 8 मई को जेल के अंदर अनशन शुरू कर दिया। ब्रिटिश सरकार यह देखकर घबरा गई। शाम तक उन्हें रिहा कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने दूसरे असहयोग आंदोलन की घोषणा की।
पूरे देश में शुरू हो गया विवाद
उसी दौरान गांधी जी की गिरफ्तारी से पूरे देश में भारी विरोध हुआ। तिरुपुर में त्यागी पीएस सुंदरम के नेतृत्व में एक विशाल रैली निकली। सैकड़ों युवाओं ने तिरंगा लहराते हुए रैली निकाली। ब्रिटिश पुलिस को यह रैली नागवार गुजरी। अचानक रैली पर भयंकर लाठीचार्ज कर दिया गया। रैली में शामिल युवाओं की हड्डियां टूटने की आवाजें आने लगीं। खून का कतरा जमीन पर गिरने लगा। ऐसा देख पुलिस और प्रदर्शनकारी भिड़ गए। तिरुपुर एक युद्ध के मैदान की तरह लगने लगा। कई घंटे बाद जब यह लड़ाई खत्म हुई तो एक युवक को देख सभी के रोंगटे खड़े हो गए। उस युवक ने अपनी जान दे दी, लेकिन तिरंगे को जमीन पर गिरने नहीं दिया। सड़क के किनारे छाती पर मजबूती से तिरंगा लिए हुए उसका शव मिला। वह 27 वर्षीय कुमारन थे, जिन्हें कोडी कथा कुमारन कहा जाने लगा।
स्टेशन के पास है स्मारक
आज उनकी प्रतिमा के साथ उनके नाम पर तिरुपुर रेलवे स्टेशन के पास एक स्मारक बना है। तिरुपुर में मुख्य सड़क का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपनी 118वीं जयंती पर इरोड में संपत नगर का नाम त्यागी कुमारन रोड रखा।
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