
हेल्थ डेस्क. 19वीं सदी में एक लड़की ने अनोखी कहानी लिखी। 9 साल की उम्र में गृहस्थी संभालने वाली आनंदी गोपाल जोशी (Anandi Gopal Joshi) की जिंदगी बहुत कम दिनों की रही। लेकिन उसने अपना नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज करा दिया। वो भारत की पहली महिला डॉक्टर बनीं। आज भी वो उन लड़कियों के लिए मिसाल हैं जो तमाम कठिनाइयों को पार कर अपना मुकाम बनाने की कोशिश में लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (international Women’s Day) पर आइए जानते हैं आनंदी गोपाल जोशी की प्रेरक कहानी।
9 साल की उम्र में 20 साल बड़े लड़के से शादी
आनंदी गोपाल जोशी का जन्म महाराष्ट्र के ठाणे के कल्याण में 31 मार्च 1865 में हुआ। बचपन में उनका नाम यमुना था। ब्राह्मण परिवार में जन्मी आनंदी का बचपन का नाम यमुना था। 9 साल की उम्र में 20 साल बड़े गोपालराव जोशी से उनकी शादी करा दी गई। शादी के बाद उनका नाम आनंदी रखा गया था। सोचिए जिस उम्र में बच्चे गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं उस उम्र में उनकी शादी हो गई थी, वो भी एक बड़े उम्र के इंसान के साथ।
14 साल की उम्र में मां बनीं
आनंदी के लिए राहत की बात ये थी कि उनके पति गोपालराव काफी प्रगतिवादी विचारक थे। वो पोस्टल क्लर्क थे। पत्नी का सम्मान करते थे। आनंदी 14 साल की उम्र में मां बन गई थी। लेकिन 10 दिन बाद ही उनकी संतान की मौत हो गई। इस घटना ने उन्हें इतना आघात पहुंचाया कि उन्होंने डॉक्टर बनने का संकल्प ले लिया।
आनंदी गोपाल ने लिया ये संकल्प
आनंदी गोपाल के बच्चे की चिकित्सा मदद नहीं मिलने से मौत हुई थी। जिसकी वजह से उन्होंने डॉक्टर बनने का फैसला लिया और संकल्प लिया कि वो मेडिकल हेल्प नहीं मिलने की वजह से किसी की भी मौत नहीं होने देंगी। लेकिन उनका रास्ता आसान नहीं था। समाज में उनकी काफी आलोचना हुई। लेकिन उनके पति गोपालराव उन्हें पढ़ाना चाहते थे। पहले तो उन्होंने आनंदी को मिशनरी स्कूल में एडमिशन दिलवाने की कोशिश की। लेकिन जब वहां एडमिशन नहीं हुआ तो वो उन्हें कोलकाता ले गए। यहां पर आनंदी ने संस्कृत और अंग्रेजी दोनों भाषा में शिक्षा ली।
पति का मिला पूरा सहयोग
आनंदी का सपना पूरा करने के लिए गोपालराव ने 1980 में एक फेमस अमेरिकी मिशनरी रॉयल वाइल्डर को खत भेज कर अमेरिका में पढ़ाई की जानकारी ली। इस पत्राचार को वाइल्डर ने उनके प्रिंसटन की मिशनरी समीक्षा में पब्लिश किया। जिसे पढ़कर न्यू जर्सी के रहने वाले शख्स थॉडिसीया कार्पेन्टर काफी प्रभावित हुए और आनंदीबाई को अमेरिका में आने का प्रस्ताव दिया।
गिरते स्वास्थ्य के बावजूद मेडिकल की पढ़ाई के लिए अमेरिका गईं
लेकिन आनंदी के लिए अमेरिका पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। उनकी हेल्थ कमजोर हो रही थी। सिरदर्द, बुखार और सांस लेने में समस्या हो रही थी। थॉडिसीया ने अमेरिका से उनके लिए दवाएं भेजी। 1883 में गोपालराव ने पत्नी को अमेरिका में मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए भेजा। हालांकि उनकी सेहत अच्छी नहीं थी इसके बाद भी उन्होंने ये कठोर फैसला लिया। आनंदी कलकत्ता से न्यूयॉर्क पानी के जहाज से गई। वहां पर उन्होंने पेनसिल्वेनिया की वुमन मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। 19 साल की उम्र में वो मेडिकल ट्रेनिंग लेना शुरू कर दिया। अमेरिका के ठंडे मौसम में वो तपेदिक की बीमारी की शिकार हो गई। बावजूद इसके उन्होंने 11 मार्च 1885 को एमडी से स्नातक की डिग्री हासिल कीं।
सपना हुआ पूरा संकल्प रह गया अधूरा
1886 में जब वो डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर भारत लौंटी तो उनकी सेहत और बिगड़ गई। 26 फरवरी 1887 में उनकी मृत्यु हो गई। 21 साल की उम्र में वो इस दुनिया को छोड़ गई। उनका संकल्प तो पूरा नहीं हुआ लेकिन वो लड़कियों के लिए एक रास्ता बनाकर गई।
महिलाओं के लिए बनाना चाहती थीं मेडिकल कॉलेज
आनंदी सेरमपुर कॉल हॉल में संबोधित करते हुए महिलाओं को डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने महिलाओं के लिए एक मेडिकल कॉलेज खोलने का इरादा भी बताया था। उन्होंने बताया था कि वो मेडिकल की डिग्री लेने के लिए अमेरिका जा रही हैं। उनके भाषण ने ऐसा जादू किया था कि पूरे भारत से उन्हें वित्तिय सहयोग मिला, जिसके बाद वो अमेरिका गई थीं। उनका सपना तो पूरा हुआ, लेकिन संकल्प अधूरा रह गया। जिसे आज की महिला डॉक्टर पूरा कर रही हैं।
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