
बिहार की पारंपरिक आभूषण शिल्पकला का इतिहास सदियों पुराना है और यह जूलरी आर्ट बिहार की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार की ये जूलरी डिजाइन्स मुख्य रूप से स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाई जाती हैं। खासतौर पर शादी-ब्याह, त्यौहार और सांस्कृतिक अवसरों पर इनको पहनना शान माना जाता है। बिहार के ये जूलरी डिजाइंस न केवल महिलाओं के सौंदर्य को बढ़ाती हैं, बल्कि उनके इतिहास और परंपरा का भी प्रतीक हैं। हर एक आभूषण एक कहानी बताता है और बिहार की संस्कृति को जीवंत रखता है। यहां जानें बिहार की 9 सबसे लोकप्रिय पारंपरिक जूलरी डिजाइन्स।
चूड़ा पहनने की परंपरा बिहार और उत्तर भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। इसे दुल्हन की शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। डिजाइन की बात करें तो चूड़े में लाल और सफेद चूड़ियों का कॉम्बिनेशन होता है, और इसे खासकर शादी में पहनाया जाता है। इसमें गोले (गोल्ड प्लेटेड), मीनाकारी, या कांच के काम का उपयोग भी किया जाता है।
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मंगलसूत्र का प्रचलन बिहार के साथ-साथ पूरे भारत में है। यह विवाहित महिलाओं का मेन जूलरी है। मंगलसूत्र में मुख्य रूप से सोने और काले मनकों की माला होती है, जो विवाहित जीवन के बंधन का प्रतीक मानी जाती है। अब इसे कई डिजाइनों में देखा जा सकता है, जैसे छोटे और साधारण या भारी और इंट्रीकेट डिजाइन वाले मंगलसूत्र।
बिहार में नथुनी का चलन मुगल काल से माना जाता है, जब नाक में आभूषण पहनना रानी-महारानियों के बीच प्रतिष्ठा का प्रतीक था। नथुनी गोल और बड़ी होती है, जिसमें अक्सर मोती या सोने की डिजाइन होती है। इसे बिहार में विशेष अवसरों और त्योहारों पर पहना जाता है।
पायल का प्रचलन भारत में बहुत पुराना है, और इसे महिलाओं के पारंपरिक आभूषण के रूप में देखा जाता है। बिहार में इसका प्रचलन खासकर ग्रामीण इलाकों में बहुत अधिक है। पायल या पाजेब चांदी से बनी होती है और इसके साथ छोटे घुंघरू लगे होते हैं, जो चलते समय मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं। यह खासतौर पर दुल्हनों के पैरों की शोभा बढ़ाने के लिए बनाई जाती है।
हंसुली का डिज़ाइन प्राचीन बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित हुआ था। इसे गांवों की महिलाओं द्वारा पवित्रता और धार्मिकता के प्रतीक के रूप में पहना जाता था। हंसुली एक मोटा, ठोस चांदी या सोने का हार होता है। इसका आकार वक्राकार होता है, जो गले को अच्छे से ढकता है और इसे सादगी और ठोस बनावट के कारण लोकप्रियता मिली है।
बिहार में कड़ा पहनने का प्रचलन राजाओं और वीर योद्धाओं के समय से है। कड़ा न केवल आभूषण बल्कि शक्ति और संकल्प का प्रतीक भी माना जाता था।कड़ा एक मोटी चूड़ी के रूप में होता है, जिसे चांदी या सोने से बनाया जाता है। इसकी बनावट ठोस होती है और इसमें नक्काशी की गई होती है, जो इसे आकर्षक बनाती है।
इतिहास: कटमल या कटमाला का चलन पुराने समय से बिहार की ग्रामीण और राजसी परंपराओं का हिस्सा रहा है। यह एक भारी और जटिल डिजाइन वाला हार है, जो गले में पहना जाता है। इसमें गोल्ड या सिल्वर प्लेटिंग के साथ-साथ मोतियों का भी काम होता है, जो इसे भव्यता प्रदान करता है।
बिचुआ बिहार के पारंपरिक आभूषणों में से एक है, जिसे खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में विवाहित महिलाओं के लिए अनिवार्य माना जाता है। बिचुआ छोटे आकार का चांदी का एक अंगूठा होता है, जो पैरों की अंगुलियों में पहना जाता है। इसकी डिजाइन में सांप के आकार का संकेत होता है, जिससे इसे ‘बिचुआ’ कहा जाता है।
झुमका का ट्रेंड बिहार में पुराने समय से चला आ रहा है। इसे मुख्य रूप से कानों में पहनने के लिए डिजाइन किया गया है। झुमका का आकार गोल होता है और इसके निचले भाग में मनकों या मोतियों के झुमके होते हैं। झुमके पारंपरिक आउटफिट के साथ अच्छे से मैच होता है और हर ओकेजन पर पहने जाते हैं।
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