
राजकोट. गुजरात के शहर राजकोट के एक साधारण घर से मोहनदास के महात्मा बनने की यात्रा शुरू हुई। वह घर जहां पला-बढ़ा एक बच्चा संघर्षरत युवा और फिर वह शख्सियत बना जिसने न केवल भारत के भाग्य को तराशा बल्कि दुनियाभर के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बने। यह वही घर है जहां गांधी ने अपने जीवन के निर्णायक वर्ष बिताये। इस घर ' कबा गांधी नो डेलो' की दीवारें अगर बोल सकती तो वे मोहनदास के महात्मा बनने की कहानी बयां करती।
महात्मा गांधी के पिता के नाम पर है घर
हालांकि ये नहीं बोलती , लेकिन कबा गांधी के नाम से प्रसिद्ध उनके पिता करमचंद गांधी के नाम वाले इस घर में अब एक संग्राहलय है। दर्शक यहां मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन और उनकी गाथा को समझ सकते हैं। महात्मा गांधी बनने से वर्षो पहले युवा मोहनदास ने 19 वीं सदी की शुरुआत में ऐसे कार्य किए जिन्हें रुढ़ीवादी हिंदू परिवार के लिए घृणित समझा जाता था। पुराने राजकोट की एक संकरी गली में स्थित यह घर उन कार्यों का मूक गवाह है जिन्होंने महात्मा की मान्यताओं का आधार तय किया और चरित्र को गढ़ा। एक ऐसा व्यक्ति जिसने गलतियां की लेकिन उन पर विजय भी पाई और बाद में राष्ट्रपिता बने।
7 साल से लेकर 22 साल तक गांधी इसी घर में रहे
गांधी सात वर्ष के थे जब वह राजकोट आए और 22 वर्ष की आयु तक यहां रहे। अपनी युवावस्था का अधिकांश समय उन्होंने यहां बिताया। इस दौरान इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की। कबा गांधी नो डेलो के प्रबंध न्यासी हेलीबेन त्रिवेदी ने बताया कि पोरबंदर महात्मा गांधी का जन्मस्थान और अहमदाबाद कर्मभूमि, लेकिन राजकोट वास्तव में उनकी संस्कारभूमि है। यहीं पर उनकी मोहन से महात्मा की यात्रा शुरू हुई। त्रिवेदी ने कहा कि गांधी की यह मान्यता कि अहिंसा और सचाई से सबकुछ हासिल किया जा सकता है राजकोट में ही बनी। भारत और दुनियाभर में महात्मा गांधी के 150 वें जयंती वर्ष पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
गांधी ने भी की थी ये गलतियां
उन्होंने गलतियां की और उन पर पछतावा भी महसूस किया लेकिन इन्हें पिता के सामने स्वीकारने का साहस भी दिखाया। त्रिवेदी ने कहा ' आप नाम लीजिये और उन्होंने वह कर दिखाया। जैसे कर्ज चुकाने के लिए परिवार के गहने चुराना , अपने शाकाहारी परिवार को बताए बिना मांसाहार का सेवन , धूम्रपान करने और वेश्यालय जाने के लिए नौकर के पैसे चुराना। ' गांधी ने अपनी इच्छा को पत्नी कस्तूरबा पर भी थोपने का प्रयास किया। यह महसूस होने पर कि वह अपनी इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रहे हैं गांधी ने एक बार आत्महत्या का असफल प्रयास भी किया। गांधीवादी जोली प्रवासी राजकोट में बिताए गांधी के जीवन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं।
बचपन में अंधेरे से डरते थे गांधी
प्रवासी कहते हैं बचपन में वह अंधेरे से डरते थे और कमरे में प्रकाश के बिना सो नहीं सकते थे। उनकी नौकरानी ने इस डर को दूर करने के लिए भगवान राम के नाम का जाप सिखाया और उन्होंने यह किया। बाद में वह ब्रिटिश राज से लोहा लेने से भी नहीं डरे। अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में गांधी ने लिखा है, 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में मेरा जन्म हुआ , लेकिन इस शहर की मुझे कोई स्पष्ट याद नहीं है क्योंकि जब मैं केवल सात साल का था मेरा परिवार राजकोट चला गया। उनकी स्कूली और उच्च शिक्षा ज्यादातर राजकोट में हुई। यहां उनके पिता दीवान थे। जोली कहते हैं कि सोना चुराने को लेकर पिता के समक्ष की गई स्वीकारोक्ति ने उन्हें अहिंसा की ताकत का एहसास कराया।
पिता ने कराया अहिंसा की ताकत का एहसास
गांधी ने अपने पिता के समक्ष एक हस्तलिखित नोट में 25 रुपये का कर्ज चुकाने के लिए भाई के सोने के ब्रेसलेट के एक भाग को चुराने की बात स्वीकार की थी , लेकिन पिता ने उनके गालों पर बह रहे आंसूओं को पोंछते हुए इस नोट को फाड़ दिया। अपनी आत्मकथा में गांधी ने कहा है कि उन्हें इस कृत्य के लिए कड़ी डांट - फटकार और पिटाई की उम्मीद थी , लेकिन उनके पिता के कदम ने उन्हें दिल जीतने के लिए अंहिसा की ताकत का अहसास कराया। सत्य के लिए उनके प्यार ने उन्हें मांस से विरत कर दिया क्योंकि वह अपनी मां से झूठ नहीं बोल सकते थे। यह अहसास होने के बाद कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ जो किया वह उचित नहीं था , वह हिंदू समाज में महिलाओं के लिए समान अधिकारों के समर्थक बन गए।
राजकोट से ही शुरु हुई थी महात्मा बनने की कहानी
त्रिवेदी ने कहा कि निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि मोहन से महात्मा बनने की यात्रा राजकोट से शुरू हुई। वह जोर देते हैं कि गांधी के सशक्त चरित्र की बुनियाद उनके राजकोट के घर में पड़ी। डेढ़ सदी बाद भी गांधी जीवित हैं।
(यह खबर न्यूज एजेंसी पीटीआई भाषा की है। एशियानेट हिंदी की टीम ने सिर्फ हेडलाइन में बदलाव किया है।)
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