
नई दिल्ली (वेणु राजामोनी, भारत के पूर्व राजदूत)। नई दिल्ली 9-10 सितंबर को जी20 शिखर सम्मेलन (G20 Summit) के लिए तैयार है। दिल्ली में 18वां जी20 शिखर सम्मेलन हो रहा है। इसमें 19 देशों (अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) और यूरोपीय संघ के नेता हिस्सा लेंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, यूके के पीएम ऋषि सुनक, कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो, जापानी पीएम फुमियो किशिदा और सऊदी अरब के किंग सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आने वाले हैं। भारत ने बांग्लादेश के पीएम और यूएई के किंग समेत नौ देशों के नेताओं को भी मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया है। इस सम्मेलन में दो प्रमुख नेता हिस्सा नहीं ले रहे हैं। एक हैं रूस के राष्ट्रपति पुतिन और दूसरे हैं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।
1999 में हुआ था G20 का गठन
G20 का गठन 1990 के दशक के वित्तीय संकट की पृष्ठभूमि में 1999 में किया गया था। G20 सदस्य ग्लोबल GDP में करीब 85%, ग्लोबल ट्रेड में 75% और विश्व की जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई हिस्सा रखते हैं। जी20 की स्थापना अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए एक मंच के रूप में की गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान भारत को G20 का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया था।
शिखर सम्मेलन का आयोजन हर साल होता है। इसकी मेजबानी रोटेशन के आधार पर प्रत्येक सदस्य देश को दी जाती है। पिछला शिखर सम्मेलन इंडोनेशिया में आयोजित किया गया था। अगला शिखर सम्मेलन ब्राजील में होगा। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका में होगा। दरअसल, भारत की बारी पिछले साल (2022) में आने वाली थी, लेकिन सरकार ने 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी बारी इंडोनेशिया के साथ बदलने का फैसला किया था।
भारत ने शिखर सम्मेलन के लिए अपनी प्राथमिकताओं को समावेशी और लचीला विकास बताया है। शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन G20 नेताओं की घोषणा को जारी किया जाएगा। इससे पता चलेगा कि पूरे वर्ष विभिन्न मंत्रिस्तरीय और कार्य समूह की बैठकों में जिन मुद्दों पर चर्चा की गई उसपर संगठन द्वारा क्या फैसला लिया गया है और संगठन की प्राथमिकताएं क्या हैं।
अफ्रीकी संघ को आमंत्रित करने की हो रही सराहना
भारत ने शिखर सम्मेलन से पहले विकासशील देशों के साथ चर्चा करके खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में स्थापित किया है। भारत ने अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनने के लिए भी आमंत्रित किया है। इसकी सराहना हो रही है। इस तरह के प्रयास शक्तिशाली देशों द्वारा एकतरफा फैसला लेने और कार्रवाई करने से विपरीत है। G20 के शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर है। हालांकि इस संगठन की आलोचना भी होती है। कहा जाता है कि वित्तीय संकट के बाद जी20 बातचीत की दुकान बनकर रह गया है। इसने विश्व समुदाय ने संकट के समय जिस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए वह नहीं की।
शिखर सम्मेलन में दुनिया के सामने आने वाली प्रमुख राजनीतिक चुनौतियों (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूक्रेन की इच्छा थी कि भारत उसे शिखर सम्मेलन और संबंधित बैठकों में आमंत्रित करे, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। यूक्रेन चाहता था कि जी20 मंच और भारत समेत अन्य देश लड़ाई खत्म करने के लिए रूस के साथ मध्यस्थता करें। रूस-यूक्रेन लड़ाई के मुद्दा ने जी20 की बैठकों पर असर डाला है। रूस की आपत्ति के चलते बैठकों में सर्वसम्मति के दस्तावेज नहीं बन सके हैं।
शिखर सम्मेलन के सामने है रूस-यूक्रेन युद्ध की चुनौती
भारत के सामने यह चुनौती है कि वह शिखर सम्मेलन को रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पटरी से उतरने से रोके। ऐसा नहीं हुआ तो शिखर सम्मेलन के बाद संयुक्त घोषणापत्र जारी नहीं होगा। इस बात की घोषणा नहीं होगी कि बैठक में क्या फैसले लिए गए हैं। शिखर सम्मेलन से पहले चीन ने भारत के साथ विवादित क्षेत्रों को अपना बताने वाला नक्शा जारी किया है। सम्मेलन पर इस मुद्दे का असर पड़ सकता है।
भारत ने जी20 शिखर सम्मेलन का इस्तेमाल अपनी विविधता, संस्कृति और क्षमताओं को दुनिया के सामने पेश करने के लिए किया है। शिखर सम्मेलन द्वारा भारत ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन दुनिया के सामने किया है। इससे भारत के राजनयिक संबंधों और प्रभाव को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। अफ्रीकी देशों और गैर-सदस्य देशों को अतिथि के रूप में आमंत्रित करने से उन देशों के साथ भारत के संबंध मजबूत होंगे।
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शिखर सम्मेलन में भारत ने विकास और प्रगति के मुद्दों पर वैश्विक एजेंडे को आकार देने की कोशिश की है। भारत ने अपने सभी संसाधनों का उपयोग करके इस अवसर का अच्छी तरह से इस्तेमाल किया है। हालांकि, G20 गतिविधियों की हड़बड़ाहट के पीछे प्रधानमंत्री मोदी को एक वैश्विक राजनेता के रूप में स्थापित करके देश के भीतर राजनीतिक लाभ हासिल करने की एक स्पष्ट रणनीति भी रही है। सत्ताधारी दल बीजेपी द्वारा बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के चलते भारत का वैश्विक शक्ति के रूप में उदय हुआ है।
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