
नई दिल्ली(New Delhi). सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी में रेलवे की 29 एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज(5 जनवरी) को सुनवाई करते हुए रोक लगा दी। देश में अतिक्रमण के खिलाफ यह एक बड़ा एक्शन माना जा रहा है, जो देशभर के मीडिया की सुर्खियों में है। हाईकोर्ट ने अतिक्रमणकारियों को 9 जनवरी तक सामान हटाने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए उत्तराखंड सरकार से कहा कि इतने सारे लोग लंबे समय से वहां रह रहे हैं। उनका पुनर्वास तो जरूरी है। 7 दिन में ये लोग जमीन कैसे खाली करेंगे?
कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि जमीन पर लोग आजादी के पहले से रह रहे हैं। सरकार जमीन को अपना बता रही है, जबकि रेलवे अपनी। इस पर बेंच ने कहा कि निश्चित तौर पर जमीन रेलवे की है, तो उसे इसे डेवलप करने का अधिकार है। लेकिन यहां के लोगों का पुनर्वास भी होना चाहिए। बेंच ने कहा कि लोगों का दावा है कि वो 1947 के बाद यहां आए थे। प्रॉपर्टी नीलामी में रखी गई थी। आप डेवलपमेंट कीजिए, लेकिन पुनर्वास की मंजूरी दी जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो रेलवे और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर रही है। वहां और अधिक कब्जे पर रोक लगे। मामले की अगली सुनवाई 7 फरवरी को होगी। जानिए देशभर में चर्चा का विषय बना हल्द्वानी अतिक्रमण मामला आखिर है क्या?
1. रेलवे के मुताबिक, जमीन पर 4,365 अतिक्रमणकारी हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसए नज़ीर और पीएस नरसिम्हा की बेंच ने एडवोकेट प्रशांत भूषण द्वारा मामले का उल्लेख किए जाने के बाद मामले को सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया था।
2. यहां के निवासियों ने अपनी याचिका में कहा कि है कि हाईकोर्ट ने इस तथ्य से अवगत होने के बावजूद कि याचिकाकर्ताओं सहित निवासियों के टाइटल के संबंध में कार्यवाही जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित है, विवादित आदेश पारित करने में गंभीर गलती की है।
3.याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उनके पास वैलिड डॉक्यूमेंट्स हैं, जो स्पष्ट रूप से उनके टाइटल(जमीन) और वैध व्यवसाय को स्थापित करते हैं।
4.याचिका में यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट को राज्य के खिलाफ वोट बैंक की राजनीति के आरोप लगाने के बजाय इन सभी दस्तावेजों पर उचित विचार करना चाहिए था। इसके अतिरिक्त, स्थानीय निवासियों के नाम हाउस टैक्स रजिस्टर में नगरपालिका के रिकॉर्ड में दर्ज किए गए हैं। और वे नियमित रूप से हाउस टैक्स का भुगतान कर रहे हैं।"
5.उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 20 दिसंबर को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन पर कब्जा किए गए निर्माण को गिराने का आदेश दिया था।
6. हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि अतिक्रमणकारियों को एक सप्ताह का नोटिस दिया जाए, जिसके बाद अतिक्रमण तोड़ा जाए।
7. बनभूलपुरा में रेलवे की कथित अतिक्रमित 29 एकड़ जमीन पर धार्मिक स्थल, स्कूल, व्यापारिक प्रतिष्ठान और आवास हैं।
8.रविशंकर जोशी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 9 नवंबर 2016 को 10 सप्ताह के भीतर रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था।
9. अदालत ने कहा था कि सभी अतिक्रमणकारियों को रेलवे सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम 1971 के तहत लाया जाए।
10. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अतिक्रमण वाली जमीन पर करीब 50,000 लोग रहते हैं, जिनमें से 90% मुस्लिम हैं।
11.स्थानीय निवासियों ने कहा कि क्षेत्र में पांच वार्ड हैं, जिनमें 25,000 वोटर हैं। यहां बुजुर्ग, गर्भवती महिलाओं और बच्चों की संख्या 15,000 के करीब है।
12. प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान 10 एडीएम और 30 एसडीएम-रैंक के अधिकारियों को प्रक्रिया की निगरानी करने का निर्देश दिया है।
13.मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यहां 1910 के बाद से कई परिवपार बनभूलपुरा में गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर कॉलोनियों में रह रहे हैं। क्षेत्र में चार सरकारी स्कूल, 10 निजी, एक बैंक, चार मंदिर, दो मजार, एक कब्रिस्तान और 10 मस्जिदें हैं। बनभूलपुरा में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और एक सरकारी प्राइमरी स्कूल भी है।
14. स्थानीय लोगों का आरोप है कि भाजपा मलिन बस्तियों को हटाने से रोकने के लिए एक अध्यादेश लाई थी ,ताकि झुग्गी क्षेत्रों को नियमित किया जा सके या उन्हें स्थानांतरित किया जा सके। हालांकि अब ऐसा नहीं हो रहा। वहीं, कांग्रेस के पूर्व प्रमुख प्रीतम सिंह इस मामले को लेकर पार्टी के अन्य नेताओं के साथ मंगलवार को सीएम से मिले। पूर्व सीएम हरीश रावत ने निवासियों के समर्थन में एक घंटा का मौन व्रत भी रखा था।
15. रेलवे के मुताबिक 2013 में गौला नदी में अवैध रेत खनन को लेकर मामला कोर्ट में पहुंचा था। रेलवे ने तर्क दिया था कि रेलवे के किनारे रहने वाले लोग ही अवैध खनन में शामिल हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने रेलवे को पार्टी बनाकर इलाका खाली कराने को कहा था। तब से यह विवाद चला आ रहा है।
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