
कोलंबो. पाकिस्तान और नेपाल के बाद अब चीन ने श्रीलंका से भारत को घेरने की तैयारी की है। इसी के तहत चीन ने कन्याकुमारी से महज 290 किलोमीटर दूरी पर श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में बन रही पोर्ट सिटी को अपना ठिकाना बनाया है। इस प्रोजेक्ट का श्रीलंका में काफी विरोध हुआ, मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, इसके बावजूद सरकार ने बिल को मंजूरी दे दी।
श्रीलंका सरकार ने पोर्ट सिटी के कंस्ट्रक्शन का ठेका एक चीनी कंपनी को दे दिया है। कोलंबो पोर्ट सिटी का निर्माण 269 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे का कहना है कि इससे 5 साल में 2 लाख रोजगार मिलेंगे। इसके अलावा निवेश बढ़ेगा और देश का फायदा होगा।
विपक्ष ने किया था विरोध
वहीं, विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया। विपक्ष का कहना था कि इसमें कई ऐसी शर्तें हैं, जिनसे श्रीलंका को चीन का भावी उपनिवेश या गुलाम बनाने की राह आसान हो जाएगी। इसके विरोध में विपक्ष की ओर से 24 याचिकाओं को दायर किया गया। श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति और महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री हैं। दोनों सगे भाई हैं और देश में इस वक्त इनकी ही पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। ऐसे में सरकार ने बिल में कुछ संसोधन करके इसे सदन में पास करा लिया।
चीन ने दिखाई चालबाजी
चीन पाकिस्तान, नेपाल समेत कई देशों को कर्ज देकर लगातार अपना विस्तार कर रहा है। अब चीन ने श्रीलंका को लालच दिया था कि कोलंबो पोर्ट सिटी में पहला 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' बनाया जाएगा। यहां हर देश की करंसी से व्यापार किया जा सकेगा। ऐसे में श्रीलंका चीन की चाल में फंस गया। इससे पहले चीन हम्बनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर ले चुका है। दरअसल, श्रीलंका ने इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में सुधार के लिए चीन से अरबों डॉलर का कर्ज लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कोलंबो पोर्ट सिटी और हम्बनटोटा के लिए चीन एक अलग पासपोर्ट भी तैयार कर रहा है। हालांकि, श्रीलंका की मीडिया ने कहा है कि इसके बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। दरअसल, चीन श्रीलंका में लगातार अपनी जड़ें जमाने की कोशिश में जुटा है।
भारत की बढ़ सकती है परेशानी
कोलंबो पोर्ट सिटी भारत से काफी नजदीक है। ऐसे में यहां चीन का डेरा डालना भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत जहां कोरोना महामारी से जूझ रहा है, वहीं, चीन ने श्रीलंका में कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट लेने के लिए काफी तेजी से कदम बढ़ाए। इससे पहले श्रीलंका सरकार ने 2019 में तय हुए भारत-जापान और श्रीलंका के ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया था। इसमें भारत और जापान के 49% शेयर थे।
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