
बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से चर्चा में चल रहे कैबिनेट विस्तार को लेकर अब तस्वीर लगभग साफ होती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 6 मई को महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक बुलाकर राजनीतिक संकेतों को और मजबूत कर दिया है। इस बैठक से पहले दिल्ली में केंद्रीय नेताओं के साथ उनकी लगातार मुलाकातों ने भी सियासी गतिविधियों को नई गति दे दी है।
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि यह बैठक केवल प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बिहार सरकार के नए मंत्रिमंडल के स्वरूप को लेकर भी बड़ा संदेश दे सकती है। खास बात यह है कि बीजेपी और जेडीयू के बीच सीट और मंत्रालयों के संतुलन को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चाएं अब अंतिम चरण में पहुंचती दिख रही हैं।
मुख्यमंत्री सचिवालय में 6 मई को शाम 5 बजे कैबिनेट बैठक आयोजित की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान कई अहम प्रस्तावों पर चर्चा और मंजूरी की संभावना है। हालांकि सबसे ज्यादा चर्चा मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद बुलाई गई यह बैठक रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सत्ता गठबंधन आगामी राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए संगठन और सरकार दोनों स्तर पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
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कैबिनेट विस्तार से पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दिल्ली में कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से चर्चा की। इन बैठकों को बिहार मंत्रिमंडल विस्तार की अंतिम रूपरेखा से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व की सहमति के बाद ही अब विस्तार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। दिल्ली रवाना होने से पहले सम्राट चौधरी ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मुलाकात की थी। इस मुलाकात ने भी राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया है।
बिहार की राजनीति में फिलहाल बीजेपी और जेडीयू के बीच 15-15 फॉर्मूले की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। सूत्रों के अनुसार, संभावित विस्तार में बीजेपी के 13 और जेडीयू के 12 मंत्रियों को जगह मिल सकती है। इसके अलावा एनडीए के अन्य सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को भी मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है। राजनितिक विशेषज्ञों का मानना है कि जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए इस बार मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा ताकि सभी वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश दिया जा सके।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से भी मुलाकात की। मुलाकात के बाद मांझी का बयान राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें “अभिभावक” और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन को “भाई” बताया। मांझी ने कहा कि जब मुख्यमंत्री खुद रिश्तों की बात कर रहे हैं तो अलग से मांग करने की जरूरत नहीं रह जाती। हालांकि उनके बयान को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उन्होंने अपने बेटे और पूर्व कैबिनेट मंत्री संतोष कुमार सुमन की दावेदारी को भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने रखा।
जीतन राम मांझी ने यह भी कहा कि मंत्रिमंडल का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिसमें सभी समाज और सभी क्षेत्रों के लोगों को प्रतिनिधित्व मिले। उन्होंने बेहतर समन्वय के साथ निर्णय लेने की सलाह दी ताकि प्रदेश के समग्र विकास को सुनिश्चित किया जा सके। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बिहार में आगामी चुनावी रणनीति को देखते हुए एनडीए सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहा है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
लंबे समय से लंबित कैबिनेट विस्तार को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में अब यदि विस्तार होता है तो यह सरकार के लिए संगठनात्मक मजबूती का संकेत माना जाएगा। इसके साथ ही नए चेहरों को मौका देकर क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश भी की जा सकती है। 6 मई की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसके बाद बिहार की राजनीतिक दिशा और सत्ता संतुलन दोनों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
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