
नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश सिर्फ साझा घोषणापत्र तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में BRICS देशों ने “न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन 2026” को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। खास बात यह रही कि पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग हित रखने वाले ईरान और यूएई भी साझा भाषा पर सहमत हुए। इसे भारत की कूटनीतिक भूमिका के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
घोषणापत्र में ईरान के नागरिक और शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। BRICS ने कहा कि परमाणु सुरक्षा और IAEA के सुरक्षा उपायों का पालन संघर्ष के दौरान भी जरूरी है। इसके साथ ही लेबनान में संघर्षविराम का सम्मान करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की गई। सीरिया में विदेशी सैन्य मौजूदगी और क्षेत्रीय संप्रभुता का मुद्दा भी उठाया गया।
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BRICS ने जेरूसलम की कानूनी और ऐतिहासिक स्थिति में एकतरफा बदलाव का विरोध किया। सभी धार्मिक स्थलों की गरिमा और पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। फिलिस्तीन के मामले में दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को दोहराते हुए संयुक्त राष्ट्र में उसकी पूर्ण सदस्यता की मांग का भी समर्थन किया गया। गाजा से फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन और क्षेत्र के जनसांख्यिकीय बदलाव का विरोध किया गया।
सम्मेलन के इतर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और यूएई के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात ने भी ध्यान खींचा। पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण माहौल में दोनों नेताओं की यह मुलाकात भारत की मेजबानी में संवाद की एक अहम तस्वीर बनी। इससे संकेत मिला कि नई दिल्ली BRICS को सिर्फ औपचारिक मंच नहीं, बल्कि कठिन कूटनीतिक संवाद के लिए भी इस्तेमाल कर रही है।
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