ईरान से क्यों भागने को मजबूर हुए पारसी? जानें कैसे इस देश में 95% हुए मुसलमान

Published : Jan 09, 2026, 07:02 PM IST

Persia to Iran History: ईरान की 90-95% आबादी शिया मुस्लिम है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी यह पारसियों का देश हुआ करता था और इसका नाम पर्शिया था। तो फिर पारसी कहां गए, यह इस्लामिक देश कैसे बन गया? जानिए पर्शिया से ईरान बनने की कहानी... 

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पर्शिया का इतिहास

फारस को ही 'पर्शिया' कहा जाता था। यह शब्द पश्चिमी देशों ने इस्तेमाल किया था। इसका मूल पारसा नामक क्षेत्र से जुड़ा है, जो ईरान के दक्षिण-पश्चिम में था और जहां साइरस महान ने 6वीं सदी ईसा पूर्व में पहला फारसी साम्राज्य स्थापित किया। पारसा एक छोटा क्षेत्र था, ग्रीक इतिहासकारों ने इसे पूरे साम्राज्य के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। तब से यह नाम पश्चिमी भाषाओं में पॉपुलर हो गया। लेकिन ईरानी लोग अपनी भूमि को अलग नामों से जानते थे। इसे 'आर्यनाम', 'इरानजमीन' या 'ईरान' भी कहा जाता रहा है।

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पारसियों का देश था ईरान

करीब ढाई हजार साल पहले पर्सिया यानी फारस दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में गिना जाता था। उस समय यहां साइरस महान जैसे राजा हुए, जिनका शासन भारत से लेकर यूनान तक फैला था। उनका राज डर या जबरदस्ती पर नहीं, बल्कि इंसाफ पर चलता था। लोगों को अपने धर्म मानने की आजादी थी। इसी दौर में पारसी धर्म मजबूत हुआ। धीरे-धीरे इस जरथुस्त्र (पारसी) धर्म का बोलबाला बढ़ गया। बाद में सासानी शासकों ने पारसी धर्म को राजधर्म बना दिया। तब यह देश ज्ञान, कला और प्रशासन में काफी आगे था। पूरी दुनिया में आदर्श सभ्यता माना जाता था।

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फारस में इस्लाम कैसे पहुंचा, पारसी लोग क्यों भागने को मजबूर हुए?

7वीं सदी में अरब से इस्लाम फैलना शुरू हुआ। धीरे-धीरे मुस्लिम सेनाएं यहां तक पहुंचीं और कई युद्धों के बाद ईरान उनके कब्जे में चला गया। पारसी लोगों पर नए टैक्स लगाए गए। कई जगहों पर उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाने लगा। धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि उनके पास दो ही रास्ते थे या तो धर्म बदलो या देश छोड़ दो। पारसियों ने तय किया कि वे धर्म बचाएंगे, चाहे देश छोड़ना पड़े।

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पर्शिया से भागकर कहां गए पारसी लोग

पारसी अपने पवित्र अग्नि और धार्मिक किताबों के साथ पहले ईरान के दूसरे हिस्सों में गए। जब वहां भी खतरा बढ़ा, तो वे नावों में बैठकर समंदर पार करने निकले। ये सफर आसान नहीं था, लेकिन आखिरकार वे गुजरात के संजान पहुंचे। भारत ने पारसियों को अपनाया। संजान के राजा ने पारसियों को शरण दी। पारसियों ने वादा किया कि वे यहां की संस्कृति का सम्मान करेंगे। 721 ईस्वी में भारत का पहला पारसी अग्नि मंदिर बना। धीरे-धीरे पारसी गुजरात के अलग-अलग शहरों में बस गए। बाद में वे सूरत और फिर मुंबई पहुंचे।

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पर्शिया का नाम ईरान कब पड़ा?

21 मार्च 1935 को नवरोज के एक समारोह में रेजा शाह पहलवी ने विदेशी प्रतिनिधियों से अपील किया कि वे पर्शिया की बजाय ईरान शब्द का इस्तेमाल करें। रेजा शाह के लिए पर्शिया अतीत का प्रतीक था, जबकि ईरान भविष्य का नाम। उसने महसूस किया कि देश पश्चिमी देशों की तुलना में आधुनिकता में पीछे है और पर्शिया की छवि में भी नकारात्मक धरोहर जुड़ी थी। पिछली काजार राजशाही के समय देश पर कर्ज, भ्रष्टाचार और पतन की छवि थी। इसलिए नाम बदलकर, उन्होंने देश को एक नई पहचान और गर्व की भावना देने की कोशिश की।

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ईरान शब्द का क्या मतलब है?

ईरान शब्द 'एरियन' से आया है, जिसका मतलब है 'आर्यों की भूमि'। यह नाम प्राचीन अवेस्ता ग्रंथों (जेरथुस्त्र धर्म के पवित्र ग्रंथ) में भी मिलता है। अकेमेनिड साम्राज्य में शासकों ने अपनी भूमि को ईरानी कहा। सासानी काल में 'एरान' शब्द का इस्तेमाल साम्राज्य और लोगों दोनों के लिए किया गया।

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