
Iran-Israel-US War Climate Impact: एक हालिया जलवायु विश्लेषण में सामने आया है कि पिछले दो हफ्तों में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के कारण करीब 50 लाख टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, इस युद्ध से होने वाला उत्सर्जन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह दुनिया के 84 देशों के कुल उत्सर्जन के बराबर प्रभाव डाल रहा है। इसके साथ ही यह ग्लोबल कार्बन बजट को तेजी से खत्म कर रहा है।
स्टडी में बताया गया है कि आम नागरिकों की इमारतों का नष्ट होना उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है। ईरानियन रेड क्रिसेंट के अनुसार, ईरान में हमलों के कारण लगभग 20,000 इमारतें तबाह हो चुकी हैं। इन इमारतों के गिरने से अनुमानित 24 लाख टन CO2 (tCO2e) के बराबर उत्सर्जन हुआ है, जो कुल उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार स्टील्थ बॉम्बर, लड़ाकू विमान और नौसेना के बेड़े को सक्रिय रखने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन काफी बढ़ जाता है। क्वीनमैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के विशेषज्ञ बेंजामिन नेमार्क ने पहले बताया था कि अमेरिकी नौसेना का बड़ा बेड़ा लंबे समय तक सक्रिय रहता है, जिसे लगातार ऊर्जा, भोजन और संसाधनों की जरूरत होती है। उन्होंने इसे 'तैरता हुआ शहर' बताया, जिन्हें चलाने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है।
तेहरान और ईरान के अन्य इलाकों में तेल सुविधाओं पर हुए हमलों के कारण जहरीली एसिड रेन हुई और लाखों लोग प्रदूषण से प्रभावित हुए। इन हमलों में 2.5 से 5.9 मिलियन बैरल तेल नष्ट हो गया, जिससे करीब 1.88 मिलियन tCO2e का उत्सर्जन हुआ।
इस विश्लेषण में यह भी पाया गया कि इंग्लैंड के पश्चिमी ठिकानों से उड़ान भरने वाले अमेरिकी भारी बमवर्षक विमानों में इस्तेमाल ईंधन उत्सर्जन का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। पहले 14 दिनों में विमानों, जहाजों और सैन्य वाहनों में 150 मिलियन से 270 मिलियन लीटर ईंधन खर्च हुआ, जिससे करीब 5,29,000 tCO2e का उत्सर्जन हुआ।
रिपोर्ट में नष्ट हुए सैन्य उपकरणों के कार्बन प्रभाव को भी शामिल किया गया है। इस दौरान अमेरिका के 4 विमान, जबकि ईरान के 28 विमान, 21 नौसैनिक जहाज और लगभग 300 मिसाइल लॉन्चर नष्ट हुए। इससे करीब 1,72,000 tCO2e का उत्सर्जन हुआ। इसके अलावा, मिसाइलों और ड्रोन के इस्तेमाल से लगभग 55,000 tCO2e का अतिरिक्त उत्सर्जन हुआ।
युद्ध के शुरुआती दो हफ्तों में कुल 50,55,016 tCO2e का उत्सर्जन हुआ। यह मात्रा कुवैत या आइसलैंड जैसे देशों के एक साल के उत्सर्जन के बराबर है, या फिर दुनिया के सबसे कम उत्सर्जन करने वाले 84 देशों के कुल उत्सर्जन के बराबर है।
क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टिट्यूट के रिसर्च डायरेक्टर पैट्रिक बिगर ने कहा कि हर मिसाइल हमला पृथ्वी को और अधिक गर्म और अस्थिर बना रहा है। उन्होंने कहा, “हर रिफाइनरी में लगी आग और हर टैंकर पर हमला यह दिखाता है कि जीवाश्म ईंधन बेस्ड पॉलिटिक्स और सुरक्षित भविष्य साथ-साथ नहीं चल सकते।”
One Earth में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, फिलिस्तीन में चल रहे संघर्ष से भी करीब 33 मिलियन टन CO2e का उत्सर्जन हुआ है। इसमें बमबारी, सैन्य गतिविधियां, रक्षा ढांचे का निर्माण और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण से होने वाले उत्सर्जन को शामिल किया गया है।
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