ईरान vs US-इजराइल टकराव के दौरान क्यों खामोश हैं दुनिया की 3 सबसे ताकतवर संस्थाएं?

Published : Mar 28, 2026, 10:02 AM IST

Global Power Collapse? क्या ईरान-अमेरिका/इज़राइल युद्ध 2026 ने दुनिया की सबसे ताकतवर संस्थाओं को बेनकाब कर दिया? UNSC, NATO, EU नाकाम, ट्रंप की “Maximum Pressure” भी फेल-तो आखिर कौन जीत रहा है ये खतरनाक जियोपॉलिटिकल गेम?

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Iran-US-Israel War 2026: ईरान-अमेरिका/इजराइल संघर्ष अब सिर्फ एक क्षेत्रीय टकराव नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरी दुनिया की ताकत और सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की “मैक्सिमम प्रेशर” नीति, जिसे कभी गेम-चेंजर बताया गया था, अब उल्टा असर दिखाती नजर आ रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि ना युद्ध रुक रहा है, ना कोई ठोस समझौता सामने आ रहा है। इस पूरे संकट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये रही कि दुनिया की सबसे ताकतवर संस्थाएं भी इसे रोक नहीं पाईं।

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“दबाव से झुकेगा ईरान”-लेकिन हुआ उल्टा

ट्रंप प्रशासन का मानना था कि अगर ईरान पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ाया जाए तो वह घुटने टेक देगा। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। ईरान ने इस दबाव को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया और पीछे हटने के बजाय और ज्यादा आक्रामक हो गया। नतीजा ये हुआ कि सीमित संघर्ष एक बड़े और सीधे युद्ध में बदल गया, जिससे पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव फैल गया।

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UNSC, NATO, EU-दुनिया की तीनों बड़ी ताकतें क्यों हुई फेल?

इस पूरे संकट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये रही कि दुनिया की सबसे ताकतवर संस्थाएं भी इसे रोक नहीं पाईं। United Nations Security Council तो पूरी तरह से बंटा हुआ नजर आया। NATO में भी एकजुटता नहीं दिखी, वहीं EU भी कूटनीतिक स्तर पर कुछ खास नहीं कर पाया।

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UNSC: फैसले की जगह सिर्फ बहस का मंच बनकर रह गया

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) की जिम्मेदारी होती है दुनिया में शांति बनाए रखना, लेकिन इस संघर्ष में यह पूरी तरह बेअसर साबित हुई। असल समस्या इसकी वीटो पावर रही, जहां अमेरिका, रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्य अपने-अपने हितों के अनुसार फैसलों को रोकते रहे। जब भी कोई ठोस प्रस्ताव आया, किसी न किसी देश ने उसे वीटो कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सुरक्षा परिषद सिर्फ बयान देने तक सीमित रह गई और जमीनी स्तर पर कोई असर नहीं दिखा। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव को रोकने का जो काम इस संस्था को करना था, वह नहीं हो पाया, जिससे युद्ध लगातार खिंचता चला गया।

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NATO: एकजुटता की कमी ने खोल दी पोल

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन(North Atlantic Treaty Organization (NATO)) को दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य गठबंधन माना जाता है, लेकिन इस संकट में इसकी कमजोरी साफ दिखी। जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाए, तो नाटो के कई सदस्य देश खुलकर साथ आने से हिचकते नजर आए। खुद ट्रंप ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए नाटो को “कागजी शेर” तक कह दिया। उनका कहना था कि सहयोगी देश सिर्फ तब साथ आते हैं जब हालात संभल जाते हैं, लेकिन असली जरूरत के समय पीछे हट जाते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने नाटो की एकजुटता और उसकी विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।

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EU: कूटनीति की कोशिशें, लेकिन असर नहीं

यूरोपीय संघ (European Union) ने हमेशा कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसकी कोशिशें भी नाकाम रहीं। यूरोपीय देश 2015 के परमाणु समझौते को बचाना चाहते थे, लेकिन जब अमेरिका उससे बाहर हो गया और नए प्रतिबंध लगाए, तो EU ज्यादा कुछ कर नहीं पाया। INSTEX जैसे आर्थिक उपाय भी ईरान को राहत देने में सफल नहीं हुए। नतीजतन, EU सिर्फ चिंता जताने तक सीमित रह गया और संघर्ष को रोकने में कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सका।

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ट्रंप का यू-टर्न और ‘डीलमेकर’ छवि को झटका

दिलचस्प बात ये है कि इस पूरे संघर्ष में सबसे ज्यादा असर ट्रंप की छवि पर पड़ा है। उन्होंने खुद को “शांति लाने वाला” और “डीलमेकर” बताया था, लेकिन हालात इसके उलट दिख रहे हैं। कभी हमले की धमकी देना और फिर कुछ दिनों के लिए उसे रोक देना-इस तरह के फैसलों ने उनकी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि “मैक्सिमम प्रेशर” नीति का मुख्य लक्ष्य-ईरान को झुकाना या नया समझौता करवाना-पूरा नहीं हुआ। इसके बजाय, इसने तनाव को और बढ़ा दिया। ईरान ने भी साफ कर दिया कि वह दबाव में आने वाला नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर और कड़ा जवाब देगा।

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तेल, व्यापार और दुनिया पर असर

इस संघर्ष का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई पर असर पड़ा। तेल की कीमतों में उछाल आया और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ गया।

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बदलती दुनिया, कमजोर होती संस्थाएं

2026 का यह संघर्ष एक बड़ा संकेत दे रहा है कि पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई हैं। चाहे United Nations Security Council हो, NATO या European Union—तीनों ही इस संकट को रोकने में कमजोर साबित हुए हैं। साथ ही, यह भी साफ हो गया है कि सिर्फ दबाव और ताकत के सहारे कूटनीति नहीं चलाई जा सकती। इस संघर्ष का कोई साफ अंत नजर नहीं आ रहा, और पूरी दुनिया अब इस बात को लेकर चिंतित है कि आगे हालात किस दिशा में जाएंगे।

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