Maharashtra SIR में CEO एस. चोकलिंगम ने ECINet में बदलाव और EROs को ज्यादा अधिकार देने की मांग की है। जानें Logical Discrepancy क्या है, ECI ने क्या बदला और 2.07 करोड़ नाम ड्राफ्ट लिस्ट से क्यों छूटे।
Maharashtra SIR 2026: महाराष्ट्र में चुनावी सुगबुगाहट के बीच एक सनसनीखेज प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) एस. चोकलिंगम ने चुनाव आयोग (EC) को पत्र लिखकर मांग की है कि SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के 'नोटिस चरण' में इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) को अधिक अधिकार दिए जाएं। इस मांग ने देश के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
Maharashtra SIR: EROs को क्या अधिकार देने की मांग?
24 सितंबर के पत्र में CEO ने ECINet में कुछ बदलाव सुझाए। प्रमुख मांग यह है कि अगर सुनवाई के बाद ERO जमा किए गए दस्तावेजों से संतुष्ट है, तो वह संबंधित मतदाता को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट दे सके। इसके लिए ERO/AERO लॉगिन में ‘Exempted from Hearing’ जैसा विकल्प देने की बात कही गई। चोकलिंगम ने यह भी कहा कि निर्धारित सूची में शामिल दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर अन्य या समकक्ष दस्तावेज जमा करने का विकल्प होना चाहिए।
‘Logical Discrepancy’ क्या है?
SIR में मौजूदा मतदाता को पिछली SIR की वोटर लिस्ट से उसके माता-पिता या दादा-दादी से मैप किया जाता है। नाम, सरनेम या उम्र जैसी जानकारी में अंतर होने पर मामला ‘Logical Discrepancy’ के रूप में सामने आ सकता है। इसका मतलब अपने आप में यह नहीं है कि व्यक्ति मतदाता नहीं है।
रहस्यमयी 'लॉजिकल विसंगतियां' और सॉफ्टवेयर का शिकंजा
सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल का पेच: कानून के मुताबिक वोटर लिस्ट तैयार करने की पूरी जिम्मेदारी EROs, DEOs और CEOs की होती है। लेकिन चुनाव आयोग का ECINet सॉफ्टवेयर इतना केंद्रीकृत (सेंट्रलाइज्ड) है कि इसका पूरा नियंत्रण DG (IT) के हाथ में है।
डेटा मैचिंग की पहेली: 'लॉजिकल विसंगति' वे मामले हैं जहां सॉफ्टवेयर किसी वोटर को उसके माता-पिता या दादा-दादी से जोड़ते समय उम्र या नाम में मामूली अंतर मिलने पर एरर दिखाने लगता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह व्यक्ति असली मतदाता नहीं है, फिर भी सॉफ्टवेयर ने प्रक्रिया को पेचीदा बना दिया है।
Maharashtra SIR Draft List में कितने नाम हटे?
हैरान करने वाले आंकड़े: 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 2.07 करोड़ से ज्यादा मतदाता शामिल नहीं किए गए थे। यह पुराने मतदाता आधार का करीब 21.14 प्रतिशत है। इनमें अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत, दूसरी जगह पंजीकृत या डुप्लीकेट और अन्य श्रेणियां शामिल हैं। यह संख्या अंतिम नहीं है, क्योंकि दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया जारी है।
अधिकारियों की मजबूरी: दो चुनाव आयुक्तों (विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू) ने पहले ही सवाल उठाया था कि जब कानूनी जिम्मेदारी स्थानीय अधिकारियों की है, तो सॉफ्टवेयर के जरिए उनकी शक्तियां क्यों सीमित की जा रही हैं? 16 नवंबर को आने वाली फाइनल लिस्ट से पहले यह सवाल बड़ा रूप ले चुका है।
व्यक्तिगत सुनवाई और दस्तावेजों की अनसुनी जंग
छूट की गुहार: CEO चोकलिंगम ने मांग की है कि यदि EROs जमा किए गए दस्तावेजों से पूरी तरह संतुष्ट हैं, तो उन्हें बिना किसी लंबी पेचीदगी के लोगों को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट देने का अधिकार मिलना चाहिए।
आयोग का रुख: हालांकि 26 सितंबर को आयोग ने कुछ मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई से राहत देने की बात कही है, लेकिन क्या यह सॉफ्टवेयर की जकड़न से पूरी तरह आज़ादी दिला पाएगा? यह एक बड़ा रहस्य बना हुआ है।
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