
Manoj Jarange Patil Profile: मराठा आरक्षण आंदोलन एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में है। जालना के अंतरवाली सराटी में मनोज जरांगे पाटील का अनिश्चितकालीन अनशन जारी है और 11 सितंबर की डेडलाइन के बाद आंदोलन को मुंबई ले जाने की चेतावनी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। इस बार लड़ाई सिर्फ आरक्षण की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि कुनबी प्रमाणपत्र, ओबीसी के लाभ और पुराने रिकॉर्ड को मान्यता देने के सवाल पर अटक गई है। वहीं 11 सितंबर को कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके भी मनोज जरांगे पाटील से मुलाकात करेंगे। इन सब के बीच जानिए मनोज जरांगे पाटील कौन हैं? उनका एजुकेशन, करियर और लाइफ फैक्ट्स, अबतक कितनी बार अनशन कर चुके हैं? देखें पूरी टाइमलाइन।
बीड जिले के मटोरी गांव में जन्मे मनोज जरांगे पाटील ने 12वीं तक पढ़ाई की। रोजगार की तलाश में वह जालना पहुंचे और यहीं सामाजिक गतिविधियों से जुड़ते गए। मराठा आरक्षण आंदोलन में उनकी सक्रियता 2011 से बताई जाती है, लेकिन 2023 के अंतरवाली सराटी आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के बाद वह महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए। इसके बाद उनके लगातार अनशन और आंदोलनों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। 2026 का मौजूदा अनशन उनका 11वां अनशन बताया जा रहा है।
जरांगे की मौजूदा मांग का केंद्र कुनबी प्रमाणपत्र है। उनका कहना है कि जिन मराठा परिवारों के पुराने दस्तावेजों में कुनबी रिकॉर्ड मिलता है, उन्हें तय प्रक्रिया के तहत प्रमाणपत्र दिया जाए। इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि कुनबी समुदाय ओबीसी श्रेणी में आता है। सरकार के मुताबिक शिंदे समिति ने करीब 58 लाख कुनबी-संबंधित रिकॉर्ड खोजे हैं। 7 सितंबर को सरकार ने इन्हें ग्राम पंचायतों में उपलब्ध कराने और 10 से 17 सितंबर तक विशेष शिविर लगाने का फैसला बताया।
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सरकार का दावा है कि पात्र लोगों को दस्तावेज और नियमों के आधार पर प्रमाणपत्र दिए जा रहे हैं। वहीं जरांगे चाहते हैं कि रिकॉर्ड मिलने के बाद प्रक्रिया में देरी न हो और पात्र लोगों को उनके अधिकार जल्द मिलें। इसी अंतर ने बातचीत के बावजूद गतिरोध बनाए रखा है।
11 सितंबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके जरांगे से मिलने वाले हैं। उन्होंने पहले ही आंदोलन को समर्थन दिया है और सरकार से जल्द समाधान निकालने की मांग की है। उनकी प्रस्तावित मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब जरांगे आंदोलन की अगली रणनीति और मुंबई कूच को लेकर निर्णायक रुख अपनाए हुए हैं।
अब नजर 11 सितंबर की डेडलाइन और 12 सितंबर के संभावित मुंबई कूच पर है। अगर सरकार और जरांगे के बीच ठोस सहमति नहीं बनती, तो मराठा आरक्षण आंदोलन एक बार फिर महाराष्ट्र की सियासत और ओबीसी बनाम मराठा आरक्षण बहस को तेज कर सकता है।
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