Sistan Sand Boa India: ईरान और पाकिस्तान में पाया जाने वाला एक बेहद दुर्लभ सांप पहली बार भारत में दिखा है. रिसर्चर्स ने राजस्थान के सीकर जिले में तीन 'सिस्तान सैंड बोआ' सांप खोजे हैं. इसे भारत में पहली बार वैज्ञानिक तौर पर दर्ज किया गया है.
Rare Snake in Rajasthan: ईरान और पाकिस्तान के इलाकों में मिलने वाला एक दुर्लभ सांप अब भारत में भी मिल गया है. इसे पहली बार वैज्ञानिक तौर पर भारत में दर्ज किया गया है. रिसर्चर्स ने राजस्थान के सीकर जिले में तीन 'सिस्तान सैंड बोआ' (Sistan Sand Boa) सांप खोजे हैं. इस नई खोज से भारत में सांपों की वैरायटी में एक और नाम जुड़ गया है. वैज्ञानिक भाषा में इसे 'Eryx sistanensis' कहते हैं. यह बिना जहर वाला, मोटे शरीर का सांप है जो सूखे और रेतीले माहौल में रहने का आदी है.
जबलपुर के रिसर्चर विवेक शर्मा और रणथंभौर के 'टाइगर वॉच' से जुड़े वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट धर्मेंद्र खांडल ने साल 2025 में सीकर के रामगढ़-शेखावाटी इलाके में एक सर्वे किया था. इसी दौरान उन्हें ये तीन सांप मिले. इनकी यह रिसर्च रिपोर्ट 26 मई 2026 को 'Journal of Threatened Taxa' में पब्लिश हुई है.
सीकर की तीन अलग-अलग जगहों पर मिले सांप
रिसर्चर्स को ये तीनों सांप सीकर जिले की तीन अलग-अलग लोकेशंस पर मिले.
19 अगस्त 2025: पहला सांप एक गौशाला में मिला.
12 सितंबर 2025: दूसरा सांप सुंडा की ढाणी में एक घर के आंगन में दिखा.
21 सितंबर 2025: तीसरा सांप रुकनसर में बन रहे एक मकान के पास मिला.
इन सांपों के शरीर का आकार, रंग और स्केल्स (छिलकों) के डिजाइन जैसी शारीरिक बनावट की बारीकी से जांच की गई. इसके बाद रिसर्चर्स ने कंफर्म किया कि ये सिस्तान सैंड बोआ प्रजाति के ही सांप हैं.
'पहले ही लग गया था कि यह सांप कुछ अलग है'
रिसर्चर्स ने देखते ही भांप लिया था कि ये सांप इलाके में मिलने वाले आम सांपों से काफी अलग हैं. लेकिन उन्होंने कोई जल्दबाजी नहीं की. सांपों की गहराई से स्टडी करने के बाद ही अपनी रिसर्च रिपोर्ट पब्लिश करने का फैसला लिया. रिसर्चर धर्मेंद्र खांडल बताते हैं कि उन्हें शुरुआत में ही सांप के अलग होने का अंदाजा हो गया था, लेकिन इसकी वैज्ञानिक पहचान पक्की करने के लिए उन्होंने और ज्यादा स्टडी की.
रेड सैंड बोआ से काफी मिलता-जुलता
सिस्तान सैंड बोआ दिखने में 'रेड सैंड बोआ' (Red Sand Boa) जैसा ही लगता है, जो भारत में पहले से पाया जाता है. इसलिए इन दोनों के बीच का फर्क समझना बहुत जरूरी है. इनकी पूंछ का आकार सबसे बड़ी पहचान है. सिस्तान सैंड बोआ की पूंछ सिरे की तरफ जाते हुए धीरे-धीरे पतली होती जाती है. वहीं, रेड सैंड बोआ की पूंछ काफी लंबाई तक मोटी रहती है और बिल्कुल आखिर में जाकर पतली होती है.
राजस्थान के कई जिलों में दिखी हैं ऐसी तस्वीरें
रिसर्चर्स का कहना है कि राजस्थान में इस तरह के सांप पिछले कई सालों से देखे जा रहे हैं. धर्मेंद्र खांडल ने साल 2003 और 2006 में चूरू जिले में ऐसे ही सांपों की तस्वीरें खींची थीं. इसके बाद रिसर्चर्स को राजस्थान की कम से कम 40 जगहों से ऐसे सांपों की तस्वीरें मिल चुकी हैं. बीकानेर, हनुमानगढ़ और जैसलमेर जिलों से भी ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं.
लेकिन सिर्फ तस्वीरों के आधार पर किसी प्रजाति की वैज्ञानिक पहचान पक्की नहीं की जा सकती. रिसर्चर्स का कहना है कि सीकर में मिले वैज्ञानिक सबूतों को देखते हुए अब पुराने रिकॉर्ड्स की और ज्यादा स्टडी करने की जरूरत है.
2020 में मिली थी अलग प्रजाति की पहचान
सिस्तान सैंड बोआ को साल 2020 में ईरान में पब्लिश हुई एक टैक्सोनॉमिक स्टडी के जरिए एक अलग प्रजाति के रूप में औपचारिक पहचान मिली थी. इससे मिलते-जुलते सांपों के साथ इसकी बनावट और जेनेटिक सबूतों की तुलना करके इसे पहचाना गया था. अब राजस्थान में मिले ये तीन सैंपल इस बात का पहला वैज्ञानिक सबूत हैं कि यह सांप भारत में भी मौजूद है.
क्या ये सिर्फ रेतीले इलाकों में रहते हैं?
सीकर में जिन जगहों पर ये सांप मिले हैं, उससे इनके रहन-सहन को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं. ये रिकॉर्ड्स बताते हैं कि सिस्तान सैंड बोआ सिर्फ अलग-थलग रेत के टीलों में ही नहीं रहते. रिसर्चर्स के मुताबिक, ये सांप खेती वाली जमीन, बगीचों और इंसानी बस्तियों के आस-पास भी पाए जा सकते हैं.
अभी और स्टडी की जरूरत
राजस्थान में सिस्तान सैंड बोआ की पूरी रेंज, आबादी और उनके रहने की जगहों को समझने के लिए अभी और फील्ड सर्वे करने की जरूरत है. आगे की स्टडी से यह भी साफ करना होगा कि राज्य के बाकी जिलों से मिली सांपों की तस्वीरें क्या वाकई इसी प्रजाति की हैं.
