
Viksit Bharat Vision : एक समय ऐसा था कि भारत सोने की चिढ़िया कहा जाता था। यह बिलकुल सही है, अभी भी हर घर में सोना छिपा है। अगर यह बाहर आ जाए तो देश की तस्वीर ही बदल जाएगी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास 25,000 टन से ज्यादा सोना है, जो दुनिया के शीर्ष 10 केंद्रीय बैंकों के कुल भंडार से भी ज्यादा है। इसी पर कोटक म्यूचुअल फंड के मैनेजिंग डायरेक्टर नीलेश शाह ने अपनी राय रखते हुए 'विकसित भारत' बनाने का एक सीधा-सादा फॉर्मूला बताया है। उनका कहना है कि देश को दो मोर्चों पर काम करने की जरूरत है- पहला, घरों में बेकार पड़े सोने को किसी तरह काम में लाना और दूसरा, उद्यमियों (एंटरप्रेन्योर्स) के लिए नियमों और कानूनों के बोझ को कम करना।
मंगलवार को PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के एक कार्यक्रम में बोलते हुए शाह ने कहा कि भारत ने पिछले 25 सालों में सोना खरीदने पर भारी रकम खर्च की है। शाह ने बताया, "इस सदी के पिछले 25 सालों में, हमने आधिकारिक तौर पर 510 अरब डॉलर का सोना आयात किया है।" उन्होंने यह भी साफ किया कि यह आंकड़ा ज्वेलरी एक्सपोर्ट को घटाने के बाद का है।
भारत में लोगों के पास कितना सोना है, इस पर उन्होंने कहा कि इसका कोई सटीक आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन अनुमान है कि यह करीब 25,000 टन हो सकता है। उन्होंने मज़ाक में कहा, "सोने की तस्करी भी होती है। और अगर आप सिंगापुर या मिडिल ईस्ट से किसी फ्लाइट में आ रहे हैं, तो आपको छोड़कर उस फ्लाइट का हर यात्री बप्पी लहरी का रिश्तेदार लगता है, जो गहनों से लदा होता है।"
शाह ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हमने सोने में जितना पैसा लगाया है, उतना तो देश में नेट विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) भी नहीं आया है। शाह ने सोने को भारतीय घरों के लिए एक "भावनात्मक निवेश" बताते हुए कहा कि पॉलिसी बनाने वालों को ऐसे तरीके खोजने होंगे जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना इस धातु को काम पर लगाया जा सके। उन्होंने सवाल किया, "तिजोरी में पड़े इस सोने को हम कैसे मॉनेटाइज या फाइनेंशलाइज करें?"
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