Operation Nasr 2: CENTCOM के मिशन के बाद IRGC का इन अमेरिकी बेस पर बड़े हमले का दावा

Published : Jul 14, 2026, 09:27 AM IST
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सार

ऑपरेशन नसर-2 के तहत IRGC ने बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर हमले का दावा किया। CENTCOM के 5 घंटे के मिशन के बाद बढ़े तनाव से होर्मुज जलडमरूमध्य और मिडिल ईस्ट पर खतरा गहरा गया।

तेहरान/वॉशिंगटन: मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) इस वक्त बारूद के ऐसे ढेर पर बैठा है, जहां एक छोटी सी चिंगारी भी तीसरे विश्व युद्ध की वजह बन सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा सैन्य संघर्ष अब हर बीतते घंटे के साथ और अधिक खूंखार होता जा रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) द्वारा ईरान के दक्षिणी तट पर की गई 5 घंटे की भीषण बमबारी के जवाब में, ईरान की कुख्यात 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने 'ऑपरेशन नसर 2' (Operation Nasr 2) शुरू कर दिया है। इस जवाबी कार्रवाई ने बहरीन में मौजूद अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों को हिलाकर रख दिया है।

5 घंटे का तांडव: CENTCOM ने ईरान के तटीय ठिकानों को किया छलनी

इस खूनी ड्रामे की शुरुआत तब हुई जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों ने 13 जुलाई की रात 10:15 बजे (ईस्टर्न टाइम) ईरान के खिलाफ एक बेहद आक्रामक और समन्वित हमला शुरू किया। लगातार 5 घंटे तक चले इस मिशन में अमेरिका ने दक्षिणी ईरान के तटीय इलाकों-बुशहर, चाबहार, जास्क, कोनारक, अबू मूसा और बंदर अब्बास-को निशाना बनाया। पेंटागन ने साफ किया कि इस हमले में 'प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन्स' (सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों) का इस्तेमाल किया गया था। इसका एकमात्र मकसद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाने की ईरान की समुद्री क्षमता, मिसाइल लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर, ड्रोन साइट्स और तटीय रक्षा प्रणालियों को पूरी तरह नेस्तनाबूद करना था। अमेरिका ने चेतावनी के लहजे में कहा कि क्षेत्र में उसके 50,000 से अधिक सैनिक पूरी तरह 'सतर्क, घातक और तैयार' हैं।

 

 

'ऑपरेशन नसर 2': IRGC का बहरीन में अमेरिकी ड्रोन सेंटर पर घातक प्रहार

अमेरिका की इस भारी बमबारी के कुछ ही घंटों बाद ईरान की IRGC ने दुनिया को चौंकाते हुए 'ऑपरेशन नसर 2' का एलान कर दिया। ईरान ने दावा किया कि उसने बहरीन में मौजूद शेख ईसा एयरबेस (Sheikh Isa Airbase) पर अमेरिकी सेना के सबसे महत्वपूर्ण 'ड्रोन कमांड और कंट्रोल सेंटर' को मिसाइलों और ड्रोनों से निशाना बनाया है। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, इस हमले का मकसद सिर्फ ड्रोन सेंटर को ठप करना नहीं था, बल्कि वहां मौजूद अमेरिकी हेलीकॉप्टर रखरखाव सुविधा और P-8 इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर विमानों के वीआईपी हैंगर को भी भारी नुकसान पहुंचाना था। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक इन ठिकानों को हुए किसी भी नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन इस दावे ने खाड़ी देशों में खतरे की घंटी बजा दी है।

तबाही का बढ़ता दायरा: अल-जुफ़ैर बेस और सैटेलाइट सिस्टम निशाने पर

ईरान का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। IRGC ने अपने अभियानों का विस्तार करते हुए बहरीन के एक और प्रमुख ठिकाने 'अल-जुफ़ैर नेवल बेस' (Al-Jufair Naval Base) को भी निशाना बनाने का दावा किया है। ईरान की तरफ से दागे गए सुसाइड ड्रोनों और बैलिस्टिक मिसाइलों ने अमेरिकी सैनिकों के हथियारों के स्टोरेज (Weapon Storage), सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेंटर और उनके रहने की एक मुख्य इमारत पर सीधा प्रहार किया। ईरानी सैन्य कमान के प्रवक्ता ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यह ऑपरेशन अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह सिर्फ दूसरा चरण था। अगर अमेरिका ने अपनी सैन्य आक्रामकता नहीं रोकी, तो इसके अगले चरण और भी ज्यादा विनाशकारी होंगे।

क्या थम जाएगी दुनिया की सांसें? संकट में कतर की मध्यस्थता

इस टकराव का सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडरा रहा है। दुनिया के कुल तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। अगर ईरान इसे पूरी तरह ब्लॉक करता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति ठप हो जाएगी और दुनिया भर में महंगाई का ऐसा दौर आएगा जिसे संभालना नामुमकिन होगा। इस बीच, कतर जो अब तक दोनों देशों के बीच युद्धविराम कराने के लिए पर्दे के पीछे से मध्यस्थता (Mediation) कर रहा था, उसके हाथ-पांव भी फूल गए हैं। ईरान के इन ताबड़तोड़ हमलों ने कतर की खुद की सुरक्षा और बातचीत कराने की उसकी क्षमता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। फिलहाल, दोनों तरफ से दावों और पलटवार का दौर जारी है, और खाड़ी का समंदर बारूद की गर्मी से उबल रहा है।

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