
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी द्वारा जारी नई सूची में संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश साफ दिखाई देती है। इसी क्रम में कौशांबी की चायल विधानसभा सीट से विधायक पूजा पाल को प्रदेश उपाध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। राजनीतिक गलियारों में उनकी नियुक्ति को भाजपा की ओबीसी और दलित वर्गों के बीच पकड़ मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
पूजा पाल का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनका राजनीतिक जीवन एक ऐसे दर्दनाक घटनाक्रम के बाद शुरू हुआ, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। उनके पति और तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल की हत्या ने न केवल प्रयागराज की राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े किए थे।
साल 2005 में इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधायक रहे राजू पाल की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह घटना उनकी शादी के महज 10 दिन बाद हुई थी। उस समय इस हत्याकांड में माफिया अतीक अहमद और उसके सहयोगियों के नाम सामने आए थे। मामला लंबे समय तक प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक और आपराधिक घटनाओं में शामिल रहा।
पति की हत्या के बाद पूजा पाल ने न्याय की लड़ाई के साथ-साथ राजनीति का रास्ता चुना। उसी वर्ष हुए उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया, हालांकि उन्हें अतीक अहमद के भाई अशरफ के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा।
उपचुनाव में हार के बावजूद पूजा पाल ने राजनीतिक मैदान नहीं छोड़ा। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बसपा के टिकट पर जीत हासिल की और पहली बार विधायक बनीं। इसके बाद 2012 में भी जनता ने उन पर भरोसा जताया और वह दूसरी बार विधानसभा पहुंचीं।
हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चुनावी हार के बाद बसपा में उनकी सक्रियता कम होती गई और धीरे-धीरे पार्टी ने उन्हें किनारे कर दिया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2019 में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पूजा पाल को कौशांबी की चायल सीट से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी जीत दर्ज की और तीसरी बार विधायक बनीं।
लेकिन अगस्त 2025 में राजनीतिक घटनाक्रम अचानक बदल गया। विधानसभा के भीतर पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'जीरो टॉलरेंस' नीति की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने अतीक अहमद के आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को भी सराहा। इसके बाद उनकी मुख्यमंत्री से मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया।
इस घटनाक्रम के अगले ही दिन समाजवादी पार्टी ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए निष्कासित कर दिया। इसके बाद से उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगातार लगाई जा रही थीं।
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