
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए फांसी के जरिए मौत की सजा देने के तरीके को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। हालांकि, देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला भविष्य में वैज्ञानिक और मेडिकल समीक्षा के रास्ते बंद नहीं करता। कोर्ट के इस फैसले ने मौत की सजा पाए कैदियों के अधिकार और सजा देने के मानवीय तरीकों पर एक बार फिर नई राष्ट्रीय बहस छिड़ दी है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) [और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5)] की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसमें लिखा है कि कैदी को "तब तक गर्दन से लटकाया जाए जब तक उसकी मौत न हो जाए।" याचिकाकर्ता का तर्क था कि फांसी देने की प्रक्रिया में कैदी को मृत घोषित करने में 40 मिनट से अधिक का समय लग सकता है, जो अत्यधिक पीड़ादायक, अमानवीय और क्रूर है। उन्होंने तर्क दिया कि फांसी के बजाय जानलेवा इंजेक्शन (intravenous lethal injection), गोली मारने (shooting) या गैस चैंबर जैसे आधुनिक विकल्पों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। याचिका में दावा किया गया कि जानलेवा इंजेक्शन महज 5 मिनट में व्यक्ति को बिना दर्द के मौत की नींद सुला देता है।
VIDEO | Delhi: Advocate Rishi Malhotra on the Supreme Court dismissing plea seeking abolition of execution by hanging, says, "The Supreme Court today has passed a very historical judgment in which they have said that it's Government of India today to decide and to evaluate by way… pic.twitter.com/kyHyLjbC87
— Press Trust of India (@PTI_News) August 18, 2026
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का हवाला दिया गया, जिसके तहत 'गर्व और गरिमा के साथ जीवन जीने' के साथ-साथ 'गरिमापूर्ण तरीके से मरने का अधिकार' भी शामिल है। हालांकि, पीठ ने कहा कि 1983 के ऐतिहासिक 'दीना बनाम भारत संघ' (Deena v. Union of India) फैसले पर दोबारा विचार करने और इसे किसी बड़ी बेंच के पास भेजने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले हैं।
अदालत ने याचिका भले खारिज कर दी, लेकिन अपने आदेश में भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण खिड़की खुली रखी है:
मामले की सुनवाई के दौरान नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 'प्रोजेक्ट 39A' ने कोर्ट में दलीलें दी थीं कि जानलेवा इंजेक्शन भी अमेरिका जैसे देशों में हमेशा 100% सफल या दर्द रहित साबित नहीं हुआ है। वहीं सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने फांसी देने वाले जल्लादों पर पड़ने वाले गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव की ओर भी इशारा किया। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कोर्ट को अवगत कराया था कि केंद्र सरकार इस मुद्दे की उच्चतम स्तर पर जांच कर रही है और संभावित विकल्पों के अध्ययन के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में भारत में फांसी के विकल्प पर नीतिगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
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