Harish Rana Case: 2013 में हादसा, 13 साल की जंग… अब सुप्रीम कोर्ट ने दे दी इच्छामृत्यु की मंजूरी

Published : Mar 11, 2026, 11:52 AM ISTUpdated : Mar 11, 2026, 12:05 PM IST

Harish Rana Case: सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। यह भारत का पहला मामला है जिसमें 2018 के कॉमन कॉज फैसले को लागू किया गया। अदालत ने इसे मानवीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य बताया।

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13 साल की पीड़ा के बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे देश में चर्चा शुरू कर दी है। गाजियाबाद के युवक हरीश राणा, जो पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में थे, उन्हें अदालत ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह भारत का पहला मामला माना जा रहा है जिसमें 2018 के ‘कॉमन कॉज’ फैसले को किसी वास्तविक केस में लागू किया गया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की दो जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया।

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कोर्ट बोला: मेडिकल सपोर्ट हटाना मानवीय और कानूनी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हरीश राणा को दी जा रही मेडिकल सपोर्ट को मानवीय तरीके से हटाया जा सकता है और यह कानून के दायरे में भी आता है। अदालत ने माना कि कुछ मामलों में जीवन-रक्षक उपचार को जारी रखना ही मरीज के लिए पीड़ा बन जाता है। ऐसे में यदि चिकित्सा और कानूनी मानकों के आधार पर फैसला लिया जाए तो सपोर्ट सिस्टम हटाना भी मानवीय निर्णय हो सकता है।

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13 साल से नहीं हुआ कोई सुधार, डॉक्टरों ने बताई स्थायी स्थिति

अदालत के सामने पेश मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि हरीश राणा पिछले 13 साल से ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में हैं, यानी उन्हें न किसी चीज़ का एहसास है और न ही सुधार की कोई संभावना दिखाई दे रही है। लगातार बिस्तर पर पड़े रहने से उनके शरीर पर गंभीर घाव भी हो गए हैं। एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में साफ कहा गया कि उनके ठीक होने की संभावना नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में उन्हें लंबे समय तक इसी स्थिति में रखना मानवीय दृष्टि से सही नहीं होगा।

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माता-पिता ने ही बेटे के लिए मांगी थी दया-मृत्यु

हरीश राणा के माता-पिता ने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। उन्होंने अदालत को बताया कि 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिसके बाद से वे कोमा में हैं। माता-पिता ने कहा कि उन्होंने 13 साल तक हर उम्मीद के साथ इलाज कराया, लेकिन अब वे अपने बेटे को लगातार पीड़ा में नहीं देखना चाहते।

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क्यों ऐतिहासिक माना जा रहा है यह फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मेडिकल सपोर्ट हटाने से जुड़ा निर्णय तभी लिया जा सकता है जब वह मरीज के ‘बेहतर हित’ में हो और उसे मेडिकल ट्रीटमेंट का हिस्सा माना जाए। अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट और व्यापक कानून बनाने पर विचार करना चाहिए। 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को सैद्धांतिक मंजूरी मिली थी, लेकिन पहली बार किसी वास्तविक मामले में इसे लागू किया गया है, इसलिए इस फैसले को भारत की न्यायिक और मेडिकल व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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