Sabarimala Case: महिलाओं की एंट्री पर सुनवाई, लेकिन कोर्ट में छिड़ गई अलग बहस, फिर...

Published : Apr 28, 2026, 04:33 PM IST
Supreme Court Pulls Up Lawyer During Sabarimala Hearing Over Arguments Beyond Main Issue

सार

Sabarimala Case Supreme Court: सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक अधिकारों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मुद्दे से भटकने पर वकील अश्विनी उपाध्याय को फटकार लगाई। जस्टिस महादेवन ने कहा कि बहस केवल विचाराधीन विषय पर ही केंद्रित रहे।

केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इस बहुचर्चित मामले में जहां महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के अधिकारों पर गंभीर बहस चल रही है, वहीं सुनवाई के दौरान एक वकील को मुद्दे से भटकने पर अदालत की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।

नौ जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बहस केवल विचाराधीन मुद्दों तक सीमित रहनी चाहिए। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई, जब एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने सबरीमाला विवाद से इतर कई व्यापक सामाजिक और वैचारिक तर्क रखने शुरू कर दिए।

महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक परंपराओं पर चल रही है सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले में 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री पर अपनी दलील रखते हुए कहा कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी प्रतिबंधित है, इसलिए धार्मिक परंपराओं और आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए। यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और समानता के अधिकार से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न बन चुका है। इसी वजह से यह सुनवाई कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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बहस के दौरान अश्विनी उपाध्याय ने उठाए व्यापक मुद्दे

मंगलवार को सुनवाई के दौरान एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने तर्क दिया कि धर्म, पंथ से श्रेष्ठ है और सांप्रदायिक संघर्षों का इतिहास देश के विभाजन से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले 2000 वर्षों में सांप्रदायिक संघर्षों के कारण भारत कई हिस्सों में बंटा। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत को अपने फैसलों के दीर्घकालिक सामाजिक परिणामों पर विचार करना चाहिए। उनके अनुसार, अनुच्छेद 25 और 26 अत्यंत सीमित तरीके से लिखे गए हैं और धार्मिक स्वतंत्रता की व्याख्या व्यापक दृष्टि से होनी चाहिए। हालांकि अदालत ने बार-बार उन्हें मुख्य विषय पर लौटने को कहा।

संस्कृत, संविधान और डॉ. अंबेडकर का भी किया जिक्र

अपनी दलीलों के दौरान उपाध्याय ने संस्कृत भाषा, संविधान की शब्दावली और B. R. Ambedkar का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि संस्कृत में अंग्रेजी से अधिक अक्षर हैं और अंग्रेजी में “संविधान” या “धर्म” जैसे शब्दों का सटीक अनुवाद संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. अंबेडकर ने संस्कृत को राजभाषा बनाने के लिए विधेयक पेश किया था। इसके साथ ही उन्होंने प्राथमिक शिक्षा में धर्म को शामिल करने संबंधी अपनी जनहित याचिका का भी उल्लेख किया।

जस्टिस महादेवन ने जताई नाराजगी

जब बहस लगातार मूल मुद्दे से दूर जाती दिखी, तब न्यायमूर्ति महादेवन ने स्पष्ट रूप से हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, “आप हम सभी के द्वारा चर्चा किए जा रहे विषय से भटक रहे हैं। आपने कहा कि संस्कृत में 52 अक्षर हैं; उसी प्रकार तमिल में 247 अक्षर हैं। इन सब विषयों में न जाएं। मुद्दे पर ही ध्यान केंद्रित करें।” अदालत की यह टिप्पणी साफ संकेत थी कि संवैधानिक पीठ केवल संबंधित कानूनी प्रश्नों पर केंद्रित रहना चाहती है। एक तरह से कोर्ट ने वकील को स्पष्ट फटकार लगाते हुए बहस को सीमित रखने का निर्देश दिया।

सबरीमाला मामला क्यों है इतना अहम

सबरीमाला मामला वर्षों से धार्मिक आस्था बनाम समानता के अधिकार की बहस का केंद्र रहा है। एक ओर मंदिर की परंपरा और धार्मिक मान्यताओं की बात है, तो दूसरी ओर महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई आने वाले समय में केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों में भी महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस मामले पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है।

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