UP Vidhan sabha Chunav 2027: यूपी में बसपा का वोट शेयर घटने के बाद 2027 में दलित वोट पर कांग्रेस, सपा, बीजेपी और चंद्रशेखर आजाद की नजर है। जानें 2019 और 2024 के आंकड़े क्या संकेत देते हैं।
मायावती की कमजोर होती पकड़, 2027 में BSP का वोट किसके साथ जाएगा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का कमजोर होना सिर्फ एक पार्टी की परेशानी नहीं है। यह उस करीब 21 फीसदी दलित वोट बैंक की कहानी है, जिसने लंबे समय तक मायावती को यूपी की राजनीति का सबसे बड़ा दलित चेहरा बनाए रखा। अब सवाल यह है कि अगर बसपा की पकड़ और ढीली हुई तो यह वोट कांग्रेस, सपा, बीजेपी या चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी में से किस ओर जाएगा?
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2017 से 2024 तक कितना बदला BSP का खेल?
बसपा का वोट शेयर पिछले कुछ चुनावों में लगातार कमजोर हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 22.2 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 9.39 फीसदी रह गया। 2024 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई थी। यानी मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब सत्ता हासिल करने से पहले अपने पुराने वोट आधार को बचाने की है।
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2019 में दलित वोट ने क्यों चौंकाया था?
2019 में सपा और बसपा ने गठबंधन किया था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। गठबंधन को 15 सीटें मिलीं, जिनमें 10 बसपा और 5 सपा के खाते में गईं।
पोस्ट-पोल आंकड़ों के मुताबिक, करीब 74 फीसदी जाटव वोट गठबंधन के साथ गया, लेकिन गैर-जाटव दलितों का करीब 60 फीसदी वोट बीजेपी के साथ रहा। यही वजह थी कि गठबंधन का दलित वोट ट्रांसफर सपा को अपेक्षित फायदा नहीं दिला सका।
2024 में तस्वीर काफी बदल गई। सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी की 80 में से 43 सीटें जीतीं। CSDS के आंकड़ों के मुताबिक, 44 फीसदी जाटव वोट बसपा के साथ रहा, जबकि सपा-कांग्रेस को 25 फीसदी और बीजेपी को 24 फीसदी मिला।
सबसे बड़ा बदलाव गैर-जाटव दलित वोट में दिखा। करीब 56 फीसदी गैर-जाटव दलितों ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन किया, जबकि बीजेपी को 29 फीसदी और बसपा को 15 फीसदी वोट मिला।
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कांग्रेस और सपा की नजर किस वोट पर?
बसपा की कमजोरी ने विपक्ष के लिए राजनीतिक जगह बनाई है। कांग्रेस जातीय जनगणना, आरक्षण, संविधान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के जरिए दलित-पिछड़ा वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है। वहीं अखिलेश यादव का PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण सपा की रणनीति का अहम हिस्सा है।
दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी खासकर दलित युवाओं के बीच अपना आधार बढ़ाने में जुटी है।
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2027 में असली लड़ाई वोट ट्रांसफर की
2027 में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि बसपा कितनी सीटें जीतती है, बल्कि यह होगा कि उसके कमजोर होने पर जाटव और गैर-जाटव दलित वोट किसके साथ जाता है।
44 फीसदी जाटव वोट का 2024 में भी बसपा के साथ रहना बताता है कि मायावती का आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं गैर-जाटव वोट में बड़ा बदलाव विपक्ष के लिए उम्मीद पैदा करता है।
यही कारण है कि बसपा का मौजूदा संकट कांग्रेस, सपा, बीजेपी और चंद्रशेखर आजाद—सभी के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर और चुनौती दोनों है। 2027 में दलित वोट का बिखराव या एकजुट ट्रांसफर यूपी की सत्ता का गणित बदल सकता है।
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