
लखनऊ, 17 फरवरी। किसी भी राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा गांवों और दूरस्थ इलाकों में होती है। जहां पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सीमित सुविधाएं और स्टाफ की कमी आम शिकायत थी, वहीं पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे में व्यापक बदलाव दर्ज किए गए हैं। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सीएचसी और पीएचसी को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर दिया है, ताकि ग्रामीण आबादी को स्थानीय स्तर पर ही गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सके।
वर्ष 2017 के बाद प्रदेश में सैकड़ों नए स्वास्थ्य उपकेंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) स्थापित और उच्चीकृत किए गए। जिन केंद्रों पर पहले बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं, वहां अब 24 घंटे प्रसव सेवा, पैथोलॉजी जांच, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने से संस्थागत प्रसव दर में वृद्धि हुई है। सरकार का दावा है कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लक्ष्य के साथ डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भर्ती तेज की गई, जिससे लंबे समय से रिक्त पद भरे जा सके।
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डेंगू, मलेरिया, एईएस और जेई जैसी बीमारियों पर नियंत्रण के लिए डिजिटल सर्विलांस सिस्टम को मजबूत किया गया है। जांच प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ने से रोगों की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार संभव हुआ है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कई जिलों में मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई है।
आयुष्मान भारत योजना और मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत पात्र परिवारों को पांच लाख रुपये तक की निःशुल्क चिकित्सा सुविधा दी जा रही है। इन योजनाओं के क्रियान्वयन में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लाभार्थियों की पहचान और स्वास्थ्य कार्ड वितरण प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से पारदर्शी बनाया गया है।
कोविड-19 महामारी के दौरान प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे की मजबूती का प्रभाव देखने को मिला। गांव स्तर पर स्क्रीनिंग, जांच और टीकाकरण अभियान चलाए गए। प्रदेश ने टीकाकरण कवरेज में देश में अग्रणी स्थान प्राप्त करने का दावा किया। इस दौरान स्थापित ऑक्सीजन प्लांट, आईसीयू बेड और वेंटिलेटर जैसी सुविधाएं अब सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूती दे रही हैं।
सरकार ने नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और जिला अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण पर भी जोर दिया है। इससे प्राथमिक स्तर पर मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद उन्हें उच्च संस्थानों में रेफर करने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हुई है। 102 और 108 एंबुलेंस सेवाओं को सशक्त कर आपात स्थितियों में त्वरित सहायता सुनिश्चित की गई है।
ई-संजीवनी पोर्टल के माध्यम से टेलीमेडिसिन सेवाएं शुरू की गई हैं, जिससे दूरस्थ क्षेत्रों के मरीज विशेषज्ञों से परामर्श ले पा रहे हैं। इससे समय और खर्च दोनों की बचत हुई है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ी है।
मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में गिरावट, संस्थागत प्रसव में वृद्धि, टीकाकरण कवरेज में सुधार और संचारी रोगों पर नियंत्रण जैसे संकेतक प्राथमिक स्वास्थ्य को दी गई प्राथमिकता को दर्शाते हैं। स्वास्थ्य बजट में निरंतर वृद्धि भी इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है।
पूर्व डीजी, स्वास्थ्य विभाग डॉ. लिली सिंह के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 24 घंटे प्रसव, पैथोलॉजी और एक्स-रे जैसी सुविधाओं से सुसज्जित करना ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बदलाव है। उनका मानना है कि डिजिटल सर्विलांस, लैब नेटवर्क के विस्तार और टेलीमेडिसिन सेवाओं ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाया है।
समग्र रूप से देखा जाए तो प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे में किए गए सुधारों का असर जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है। हालांकि किसी भी व्यवस्था की वास्तविक सफलता निरंतर निगरानी, पारदर्शिता और सेवा की गुणवत्ता बनाए रखने पर निर्भर करती है। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में कितनी स्थायी और प्रभावी साबित होती है, इस पर सभी की नजर रहेगी।
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