
Ganesh Utsav History: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश उत्सव की शुरुआत होती है। ये गणेश उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है। गणेश उत्सव के पहले दिन और पंडालों में भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। 10 दिन के बाद यानी अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश उत्सव के लिए 10 दिन ही क्यों तय किए गए? आखिर इसके पीछे क्या वजह है? आगे जानिए इससे जुड़ी खास बातें।
पंचांग के अनुसार, इस बार गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इसी दिन गणपति की प्रतिमा स्थापित कर गणेश उत्सव की शुरुआत होगी। इसके बाद 10 दिनों तक अलग-अलग विधियों से भगवान श्रीगणेश की पूजा की जाएगी। उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश प्रतिमा विसर्जन के साथ होगा।
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आज गणेश उत्सव का जो भव्य रूप देखने को मिलता है, पुराने समय में ऐसा नहीं था। कई साल पहले तक गणेश चतुर्थी मुख्य रूप से एक दिन का ही पर्व माना जाता था। उस समय सार्वजनिक गणेश उत्सव और बड़े-बड़े पंडालों की परंपरा भी आज जैसी नहीं थी। लोग अपने घरों में भगवान गणेश की पूजा करते थे और इसी के साथ पर्व का समापन हो जाता था। सार्वजनिक स्तर पर गणेश उत्सव मनाने की परंपरा बाद में काफी लोकप्रिय हुई।
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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय अंग्रेजों का शासन था और बड़ी संख्या में लोगों का एक जगह इकट्ठा होना आसान नहीं था। गणेश उत्सव के जरिए लोगों को धार्मिक आयोजन के नाम पर एक साथ आने का मौका मिला। इस दौरान सामाजिक और देश से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होती थी। धीरे-धीरे सार्वजनिक गणेश उत्सव महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों में लोकप्रिय होता गया।
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की स्थापना के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन करने की परंपरा है। गणेश चतुर्थी और अनंत चतुर्दशी के बीच करीब 10 दिनों का अंतर होता है। इसी वजह से गणेश उत्सव को 10 दिवसीय उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा ज्यादा प्रचलित हुई। इन 10 दिनों में भक्त रोज भगवान गणेश की पूजा करते हैं, आरती करते हैं और उन्हें अलग-अलग तरह के भोग लगाए जाते हैं। इसके बाद अनंत चतुर्दशी पर विधि-विधान से गणपति बप्पा को विदाई दी जाती है।
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