Akhurath Chaturthi Vrat Katha: रावण ने क्यों किया अखुरथ चतुर्थी का व्रत? पढ़ें ये रोचक कथा

Published : Dec 07, 2025, 08:59 AM IST
Akhurath Chaturthi Vrat Katha

सार

Akhurath Chaturthi Vrat Katha: 7 दिसंबर, रविवार को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा है जो राक्षसों के राजा रावण से जुड़ी है। व्रत करने वालों को ये कथा जरूर सुननी चाहिए, तभी इसका पूरा फल मिलता है।

Akhurath Chaturthi Vrat Katha In Hindi: हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। हर संकष्टी चतुर्थी का एक अलग नाम है। इसी क्रम में पौष मास की संकष्टी चतुर्थी को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस बार ये चतुर्थी 7 दिसंबर, रविवार को है। इस व्रत में भगवान श्रीगणेश और चंद्रदेव की पूजा की जाती है। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है जिसके बारे में स्वयं भगवान श्रीगणेश ने अपनी पार्वती को देवी पार्वती को बताया था। इस कथा को सुने बिना व्रत का पूरा फल नहीं मिलता। आगे पढ़िए अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा…

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अखुरथ चतुर्थी व्रत कथा हिंदी में

प्रचलित कथा के अनुसार, ‘प्राचीन समय में राक्षसों का राजा सोने की नगरी लंका पर राज्य करता था। उसे अपने बल पर बहुत अभिमान था। इसी अभिमान मने उसने देवताओं तक पराजित कर दिया था। देवताओं को पराजित करने के बाद रावण वानरराज बालि से युद्ध करने गया।

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बालि को ये वरदान था कि जो भी उससे युद्ध करेगा, उसकी आधी शक्ति बालि को स्वत: ही प्राप्त हो जाएगी, जिसके कारण रावण बालि से पराजित हो गया। बालि ने रावण को बंदी बनाकर उसे अपने बेटे अंगद को खिलौने के रूप में दे दिया। अंगद रावण के गले में रस्सी बांधकर उसे नगर में घूमाने लगे।
लंकापति रावण की ये स्थिति देख नगरवासी उनका उपहास करने लगे। अपनी ये दुर्दशा देख रावण का अभिमान खत्म हो गया और उसने मन ही मन अपने दादा पुलस्त्य मुनि को याद किया। पुलस्त्य मुनि ने वहां प्रकट हुए और अपने पराक्रमी पोते की ऐसी हालत देख उन्हें बहुत ही आश्चर्य हुआ।
जब पुलस्त्य मुनि ने इसका कारण पूछा तो रावण ने कहा ‘हे पितामह, देवताओं को पराजित करने से मुझे अभिमान हो गया था, इसी वजह से आज मेरी यह दशा हुई है। मैं बालि के पुत्र अंगद की इस रस्सी के सामने भी बलहीन हो गया हूं। कृपया करके मुझे इससे मुक्त करवाइए और रक्षा कीजिए।’
पुलस्त्य मुनि ने कहा ‘बालि का जन्म देवराज इन्द्र के वीर्य से हुआ है लेकिन वह अपने पिता से भी अधिक बलशाली है। इसलिए तुम बालि से पराजित हुए हो। बालि की मृत्यु अयोध्या के राजा महाराज दशरथ के पुत्र श्रीराम जी के हाथों लिखी है, जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं।’
‘अगर तुम बालि के बन्धन से मुक्त होना चाहते हो तो तुम अखुरथ चतुर्थी का व्रत करो। पहले के समय में वृत्रासुर का वध करने के बाद देवराज इन्द्र ने भी व्रत से ही पाप से मुक्ति पाई थी। इसी से तुम्हारी समस्त समस्याओं का अंत होगा।’ ये बोलकर ऋषि पुलत्स्य वन की ओर चले गये।
इसके बाद रावण ने ऋषि पुलस्त्य के कहे अनुसार अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया, जिसके फलस्वरूप वे तत्काल बालि के बंधन से मुक्त हो गए और पुन: अपने राज्य में जाकर सुख भोगने लगे। इस कथा को सुनने मात्र से ही जीवन की परेशानियां अपने आप ही कम होने लगती हैं।


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इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।

 

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