
Sakat Chauth Vrat Katha In Hindi: माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सकट चतुर्थी कहते हैं, इसे सकट चौथ और तिल चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस बार ये व्रत 6 जनवरी, मंगलवार को किया जाएगा। इस दिन कईं शुभयोग भी बन रहे हैं जिसके चलते इस व्रत का महत्व और भी अधिक हो गया है। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है। मान्यता है व्रती (व्रत करने वाले) को ये कथा जरूर सुननी चाहिए, तभी पूरा फल प्राप्त होता है। आगे पढ़िए सकट चौथ की कथा…
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किसी समय एक गांव में कुम्हार अपने परिवार के साथ रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाने में माहिर था। एक बार जब कुम्हार ने अपने बर्तनों को पकाने के लिए अग्नि में डाला तो वे पकने नहीं। काफी प्रयास करने के बात भी उसे सफलता नहीं मिली। ये बात उसने जाकर अपने राजा को बताई।
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कुम्हार की बात सुनकर राजा को भी बहुत आश्चर्य हुआ। राजा ने राजपुरोहित से इसके बारे में पूछा और इस विचित्र समस्या का समाधान पूछा। तब राजपुरोहित ने राजा से कहा कि ‘जब भी कुम्हार अपने बर्तनों को पकाने के लिए भट्टी तैयार करे, उस समय एक बालक की बलि दी जाये।’
राजपुरोहित की बात मानकर राजा ने ये घोषणा करवा दी कि ‘सदैव भट्टी तैयार होने पर प्रत्येक परिवार को बलि के लिए एक बालक प्रदान करना होगा।’ राजा का आदेश कोई टाल नहीं सकता है। मजबूरी में बारी-बारी से सभी लोग अपने परिवार से एक-एक संतान बलि के लिए देने लगे।
उस नगर में एक वृद्ध महिला भी रहती थी, जिसका एक ही पुत्र था। महिला चौथ माता की भक्त थी। एक बार जब उस महिला के पुत्र की बलि देने का अवसर आया तो उस दिन सकट चौथ का व्रत था। वृद्धा ने अपने पुत्र को सुरक्षा कवच के रूप में सकट माता की सुपारी और दूब का बीड़ा दिया।
इसे लेकर वृद्ध स्त्री का पुत्र भट्टी में प्रवेश कर गया। उस वृद्ध महिला ने चौथ माता की पूजा करनी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद जब कुम्हार ने भट्टी खोली तो देखा कि वृद्ध महिला का पुत्र जीवित था और उसके साथ वे सभी बालक जिनकी बलि दी थी वे भी सही-सलामत भट्टी से बाहर निकल आए।
इस चमत्कार को देखकर सभी के मन में चौथ माता के प्रति आस्था जाग उठी और वे भी चौथ माता का व्रत करने लगे। तभी से सकट चौथ का व्रत बड़े स्तर पर किया जा रहा है। इस व्रत को करने से संतान की रक्षा होती है और वह हर तरह की परेशानियों से भी बची रहती है।
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