
रायपुर। आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव श्री सोनमणि बोरा ने कहा कि साझा प्राकृतिक संसाधनों यानी कॉमन्स पर जनजातीय समुदायों का गहरा विश्वास उनके सशक्तिकरण से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, पर्यावरण और विरासत के संरक्षण व संवर्धन में कॉमन्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि स्थानीय लोग ही नीति के क्रियान्वयन में सबसे आगे रहते हैं।
श्री बोरा ने जानकारी दी कि राज्य सरकार नीतिगत सुधार के लिए एक समर्पित टास्क फोर्स बनाने की प्रक्रिया में है। इसका उद्देश्य पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है, ताकि पूरे राज्य में योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके।
“छत्तीसगढ़ कॉमन्स कंवीनिंग” के दौरान संवाद में पारंपरिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को केंद्र में रखा गया। कार्यक्रम की शुरुआत पद्मश्री से सम्मानित श्री जागेश्वर यादव, श्री पांडी राम मंडावी और गौर मारिया नृत्य कलाकार सुश्री लक्ष्मी सोरी के प्रेरक उद्बोधनों से हुई।
दो दिवसीय “छत्तीसगढ़ कॉमन्स कंवीनिंग” का उद्घाटन नवा रायपुर स्थित ट्राइबल रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, सेक्टर-24 में हुआ। यह आयोजन जनजातीय विकास विभाग के सहयोग से “प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स” पहल के तहत किया जा रहा है।
10 अप्रैल को मुख्य सचिव श्री विकास शील जनजातीय नीति पर संवाद में शामिल होंगे, जबकि समापन सत्र में आदिम जाति विकास मंत्री श्री रामविचार नेताम उपस्थित रहेंगे।
श्री बोरा ने बताया कि प्राकृतिक संसाधनों और जनजातीय विरासत के गहरे संबंध को ध्यान में रखते हुए एक विशेष स्टूडियो स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। यह स्टूडियो पारंपरिक लोकगीतों, स्वदेशी वाद्य यंत्रों की धुनों के दस्तावेजीकरण, पहचान और कॉपीराइट सुरक्षा के लिए समर्पित होगा। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन बनाते हुए साझा ज्ञान को विकसित करना और विरासत को सुरक्षित रखना जरूरी है।
इस सम्मेलन में छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से 300 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें नीति विशेषज्ञ, पंचायत प्रतिनिधि, शोधकर्ता और समुदाय के सदस्य शामिल थे। सम्मेलन में 70 लाख एकड़ कॉमन्स भूमि- जिसमें जंगल, घास के मैदान और जल स्रोत शामिल हैं के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन पर चर्चा की गई। यह संसाधन ग्रामीण और जनजातीय समुदायों के लिए जीवनरेखा माने जाते हैं। पहले दिन विशेषज्ञों ने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में सामूहिक देखरेख की अहम भूमिका पर जोर दिया।
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